मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras tour

By | August 14, 2020

मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras Tour

शुरुआत में ही बता दें हम मथुरा वाले हैं। मैं लिखने, घूमने-फिरने पिक्चर देखने और तफरी मारने का बेहद शौक़ीन हूँ। इस बार बाबा विश्वनाथ की नगरी बनारस टूर /Banaras tour का प्लान बना। कब, कैसे और किस तरह हमने अपना बनारस टूर /Banaras tour  पूरा किया, सारी जानकारी तसल्ली से बताने वाला हूं, कैसा रहा मथुरा वाले का बनारस टूर/Banaras tour

बनारस टूर(Banaras Tour) काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी

                                                     बनारस टूर काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी

तो फिर से शुरू करते हैं। जैसा सबके साथ होता है, कॉलेज लाइफ तक मौजमस्ती चलती रही। फिर दोस्तों में सबसे पहले मेरी शादी हो गयी। धीरे-2 करके सब ख़ास दोस्त अलग अलग शहरों में जाकर बस गये या मेरी तरह ही जिम्मेदारियों से खुद को जबरदस्ती बांधते चले गये। इस बीच कुछ मनमौजी रह भी गये, पर वो कभी से भी ख़ास नहीं थे।

खैर बात इस बार की घुमक्कड़ी की करते हैं, तो साब हम ठहरे हलवाई! प्रोफेशन से। वो भी अपनी ख़ास किस्म के प्याज़ के खाद्य पदार्थों के लिए मशहूर। हम हर साल अपनी गृहलक्ष्मी से यही कहते कि हमारे 15 दिन पितृपक्ष के और 9 दिन नवरात्र के बिलकुल सूने-सूने रहते हैं, तुम इन 24 दिन कहीं घूमने का प्लान बना लो। हम ना नहींं कहेंगे। इस बार लक्ष्मी जी ने बात पकड़ ली थी और नहले पे दहला मारते हुए कहा कि प्लान तुम बना लो कोई भी, मैं इस बार सिर्फ चली चलूंगी। क्यूंकि हर बार उनके प्लान में कोई कमी निकाल कर हम अंत समय में सब चौपट कर दिया करते थे।
हमने भी अपने ग्रुप घुमक्कडी जिंदाबाद पर कमल जी और पारुल सहगल जी की पोस्ट पढ़ कर यूँही कह दिया कि चलो बनारस टूर/Banaras tour पर चलेंगे।
बात कुछ 11 सितंबर 2019 की तारीख को हुई थी कि 20 सितंबर को चलेंगे। बात आयी गयी हो गयी। गाहे-बगाहे श्रीमती जी ही कह देती कि कैसे चलना है? कितने दिन रुकना है ? मैं हर बार, बताता हूं कह के टाल जाता और फिर 20 को सीधे श्रीमती जी का स्कूल से फोन आया की छुट्टी हो गयी है। घंटे भर में आ रही हूँ, तैयारी रखना चलने की। मैंने मोबाइल में देखा अभी 2 बजे थे 3 बजे चलना है, मतलब आज तो बुरे फंसे, घर में किसी को कुछ मालूम नहीं और ऐसे कैसे निकल जाएं।
फिर भी यही सोचता रहा कि किसी तरह प्लान कैंसिल हो जाये। प्रार्थना करता रहा “भगवन कोई रास्ता निकालो” पर आज तो होनी को मेरा जाना ही मंजूर था। ना चाहते हुए भी 5 बजे मथुरा, उत्तर प्रदेश घर से निकले।
प्लान ये था कि अगर कानपुर होकर जायेंगे तो रात कानेपुर में मामाजी के यहाँ रुकेंगे। अगर लखनऊ होकर जायेंगे तो रात नखलऊ मौसा जी के यहाँ रुकेंगे।और फिर ब्रह्म मुहूर्त से पहले निकलेंगे तो सुबह 7 बजे तक बनारस पहुँच जायेंगे। लेकिन जब कानपुर तक पहुंचे तो 9:30 बजे रहे थे और खराब रास्ता भी पीछे छोड़ चुके थे। हमने सोचा कि जब इतने ख़राब रास्ते से इतनी जल्दी आ गये तो आगे तो अच्छा रास्ता है, आराम से सुबह तक पहुंच जाएंगे। क्यूंकि मैं पिछले साल ही प्रयागराज से कानपुर आया था अच्छी रोड मिली थी।लगा की सुबह के 3:30 बजे तक भी अगर पहुँचते हैं तो कोई बुराई नहीं। खैर गाड़ी खींची और भोर होने से पहले ही रात 2:30 बजे बनारस पहुंच चुके थे। जब हमने गोदौलिया चौक पर गाड़ी रोकी तो मीटर ने दिखाया की हम 9 घंटे 17 मिनट चल चुके हैं।
बनारस साइन बोर्ड

                                                       बनारस साइन बोर्ड

खैर वहां पता किया तो लोग बोले 4 बजे से मंगला दर्शन होंगे, हम भी ठहरे मथुरावासी।कितनी ही बार मंगला दर्शन किये हैं द्वारिकाधीश मंदिर के तो सोचा की आज यहाँ के भी करके देखते हैं। अब समस्या ये थी कि हमारे पास 1 घंटा तो बिलकुल एक्स्ट्रा था। क्यूंकि अगर लाइन में भी लगना था तो वो भी साढ़े तीन बजे से ही लगना था और होटल सुबह की करने की सोचा नहीं तो होटल वाला अभी से टाइम स्टार्ट कर देता। क्या करें, इसी उधेड़बुन में थे की याद आया की रास्ते में आते समय अभी 3-4 किलोमीटर पहले पुल से मंडुआडीह स्टेशन देखा था। बड़ा नाम सुना था कि मोदी जी चमका दिये हैं स्टेशन। फलाना-ढि़मका।  सोचा की क्यों न स्टेशन ही नजर कर आएं। तो साब गाड़ी घुमाई यू टर्न और पहुँच गए मंडुआडीह टेशन।
वहां पहुँच के पहले तो कायल हुए साफ़ सफाई के, फिर महसूस हुआ कि ये बनारस का मेन टेशन तो है नहीं। ये हमारे मथुरा छावनी जैसा ही टेशन है। फिर भी साफ-सफाई और बिजली व्यवस्था बहुत चौकस लगी। स्टेशन देखने के बाद मैं और शिवाय(मेरा बेटा) वहीं वेटिंगरूम में फ्रेश हुए और फिर हाथ मुंह धोकर चल दिए बाबा विश्वनाथ मंदिर की तरफ। हम वहां दश्वाशमेध घाट की तरफ वाले गेट से घुसे और फिर वही दृश्य चालू, बाबू जी फूल ले लो, दूध ले लो बाबा पे चढ़ता है।बाबू जी यहाँ हमारे यहाँ चप्पल उतार लो आगे जगह नहीं मिलेगी वगैरह-2।
खैर मथुरा में रहते हैं इसीलिए अभ्यस्त हैं कि ऐसा कुछ नहीं है मंदिर के बाहर चेकिंग वाले के पास भी चप्पल उतरेंगे तो भी चलेगा। पर समस्या आयी मोबाइल और कार की चाभी की। हमें लगा मथुरा की तरह यहाँ भी अमानती सामान घर होगा। लेकिन यहाँ तो सब बाहरी दुकानदारों के भरोसे था। मरता क्या न करता। एक दुकान वाले से सौदा किया वो बोला अगर हम 20 वाला माला लेंगे तो फ्री में मोबाइल, चाभी, जूता – चप्पल रखने का लाकर देगा, नहीं तो 10 रूपया लेगा सामान का। हम से पहले सेठानी बोल पड़ी कि लाओ भैया माला वाला ही प्लान भुना दो हमारे लिए।

बनारस टूर Banaras Tour की शुरुआत बाबा विश्वनाथ के दर्शन के साथ

फिर लगे लाइन में लगभग 20 मिनट बाद लाइन खिसकनी शुरू हुई और एकदम से तेज भी चलने लगी। हम बड़े खुश कि वाह कितना बड़ा मोर्चा मार लिए, सांझ को चले और सिदौसी के मंगला के दर्शन भी पा लिए। अब होटल करके चक्क सोयेंगे और उठेंगे दुपहरिया में। फिर घूमंगे बनारस पर हमारी चाहत पर भारी पड़ी हमारी किस्मत। वो भागती हुई सी लाइन एक दम से रुकी और फिर ऐसी रुकी कि सरके भी न।
बहुत पूछताछ में पता चला कि जिनकी कल रात की टिकट थी, वो अब वो दर्शन कर रहे हैं और कम से काम आधा एक घंटा लगेगा। मैं वहीं समझा की मेरी फूटी किस्मत इतनी मेहरबान कैसे हो सकती है कि सारे काम एक के बाद एक क्रम से और अपनी सोच के अनुसार हो जाएं। खैर दर्शन करके 6:30 तक बाहर आये और आधे घंटे की मसक्कत के बाद विश्वनाथ मंदिर के मैदागिन वाले गेट वाली गली के अंदर एक होटल मिला गोल्ड कॉइन। पास में ही कचौड़ी और जलेबी का नाश्ता किया फिर होटल जाकर दोपहर तक सो गये।

दूसरा दिन  बनारस के घाट और सारनाथ के नाम 

मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras tour 1 मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras tour

                                                                        बनारस के घाट

दोपहर बाद साढ़े तीन बजे एक बार फिर से नहा कर बाबा विश्वनाथ मंदिर के दर्शन किये। मंदिर के पास ही अन्नपूर्णा ट्रस्ट की तरफ से निःशुल्क भोजनालय में एक लाजवाब लंच किया। खासियत इस बात की थी कि खाना भी टेबल पर बैठ कर पत्तल में परोसा गया। तब हमें इस बात का एहसास हुआ कि हमने बेवजह होटल के मेन्यू को लेकर इतनी माथापच्ची की। फिर वहां से  बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) गये। शाम का खाना भी बाहर ही खाकर, सोने के लिए होटल वापस आ गये।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का प्रवेश द्वार

                                                                बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का प्रवेश द्वार

दूसरे दिन फिर से मंगला दर्शन किया,और फिर World Famous गंगा किनारे वाले घाट घूमे। इसके बाद दोपहर में भगवान बुद्ध के पहले उपदेश की स्थली सारनाथ पहुंचे। शाम तक थके हारे होटल वापस आकर बस सोना ही बाकी था।
सारनाथ वाराणसी

                                                               सारनाथ वाराणसी

तीसरा दिन थोड़ा एडवेंचर बाकी था, चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य, चंदौली

अभी एक और दिन बचा था हमारे पास, पहले का कोई तयशुदा प्रोगाम तो था नहीं। इस वजह से सोचा कि अगर आसपास कोई देखने वाली जगह मिल जाती है तो देखकर शाम तक वापस आ जाएंगे। Googleदेवता की मदद से पता चला कि यहीं पास में ही चन्द्रप्रभा वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी (चन्द्रप्रभा वन्य जीव अभ्यारण्य),है।
वन्य जीव अभ्यारण्य, नेशनल पार्क मुझे बचपन से ही आकर्षित करते हैं। थोड़ा इसके बारे में और जानकारी की तो पता चला यहां जंगल के बीच में दो वाटरफॉल्स भी हैं। एक क्लब का नाम नंबर भी दे रखा था वहां फोन लगाया तो उन्होंने 2000/- प्रति व्यस्क का पैकेज बताया उसमें, ट्रैकिंग, सफारी, जल प्रपात आदि दो तीन और भी आकर्षण थे। हमें थोड़ा महंगा लगा तो हमने उनसे सुबह वहीं आकर हाथो-हाथ बुकिंग करने के लिए कह कर फोन रखा और प्लान बनाया की सुबह ही निकलते हैं और वहां जाकर देखेंगे क्या करना है।

बनारस टूर का अगला पड़ाव, चन्द्रप्रभा वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी (चन्द्रप्रभा वन्य जीव अभ्यारण्य)

अभ्यारण्य बनारस से केवल 70 किलोमीटर दूर चंदौली जिले में है। यहाँ केवल जिला ही चंदौली है बाकि यह बनारस के बॉर्डर पर ही है। आधे घंटे हाईवे पर गाड़ी चलाई ही थी कि चन्द्रप्रभा का मोड़ आ गया। उसके बाद कोई 20 किलोमीटर की चिकनी सपाट सिंगल लेन की सड़क। उसके बाद वही पहाड़ों वाले उतराई चढ़ाई के घुमावदार रास्ते।
यहां तक का सफर सच में रोमांचक था। इसके बाद शुरू हुआ जंगल के अंदर का सफर। 2 लेन की साफ चिकनी मक्खन मलाई जैसी सड़क। सड़क के दोनों तरफ सूनसान बियाबान देखकर यह ख्याल आया कि अगर अपना साधन न हो तो यहां आना मुश्किल है। यहाँ पब्लिक या गवर्नमेंट का कोई ट्रांसपोर्ट सिस्टम नहीं है, एक मात्र साधन अपना वाहन ही है जिससे आप यहाँ आ सकते हैं। इसीलिए यहाँ पयर्टकों की आवाजाही कम है। आगे चलकर जल प्रपात के लिए प्रति व्यक्ति 50/- और कार का 100/- रूपया शुल्क लगता है। आपको बिल्कुल घने जंगल के बीच एक अच्छी बनी हुई पक्की सड़क से जलप्रपात पर जाना है जिनका नाम है राजदारी और देवदारी. राजदारी बिलकुल टिकट काउंटर से 1 किलोमीटर ही है और देवदारी 3 किलोमीटर अलग दिशा में, पर जैसे ही आप यहाँ प्रवेश करते हैं आपको एक अद्भुत फीलिंग आती है।
हालाँकि देवदारी में नहाने का स्थान नहीं है। वह केवल देखने का रमणीय एवं एकांत स्थल है। पूरे रास्ते में और टिकट घर को छोड़ दें तो उसके बाद जल प्रपात तक कोई इंसान न दिखा। हमें वहां, सिर्फ एक बाइक पर सवार युगल के अलावा, आप चाहें तो पानी के सहारे सहारे घने जंगल में भी जा सकते हैं। मेरे सामने वो युगल गया था, अपनी बाइक को जल प्रपात के पास खड़ी करके शायद उनको और एकांत चाहिए होगा या वो वन्य जीव प्रेमी भी हो सकते हैं।

राजदारी वाटर फॉल 

मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras tour 2 मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras tour

                                                            चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य

क्योंकि हमें नहाना भी था तो हम राजदरी आये और नहाने की अच्छी जगह ढूंढने लगे। ठीक उसी जैसा फिल्मों में होता है, जंगल के बीच से गुजरती एक नदी जो आगे चलकर 50 मीटर में वाटर फॉल बनाती है और इसी वाटर फॉल से ठीक 50 मी0 पहले नहाना वाकई रोमांचित करने वाला था। चन्द्रप्रभा उन चुनिंदा डेस्टिनेशन में से है जहां मैं दोबारा जाना चाहूंगा। हालाँकि राजदारी प्रपात पर एक सरकारी टूरिस्ट बंगलो भी है पर ये शायद लोगों के इस स्थल के अनछुए रह जाने की वजह से शायद ही बुक होता हो। क्यूंकि उसके झूलों पर जब शिवाय ने झूलने की कोशिश की तो उनपर मकड़ी के जाले, गिलहरी का अपशिष्ट एवं कई प्रकार की गंदगी पड़ी हुई थी। वहां एक बड़ी सी कैंटीन भी है, जहाँ 2-5 आदमी थे पर यात्री बिलकुल नहीं थे।

मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras tour 3 मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras tour

पूरे डेढ़ घंटे स्नान के समय कोई आदमी हमें वहां आता जाता न दिखा। अलबत्ता  हमसे थोड़ी दूर पर जो हिरन पानी पीने आये, जब हमने छेड़े तो वापस जंगल में भाग गये। खैर हमने जल क्रीड़ा करते समय जो एक महत्त्वपूर्ण बात नोट की वो ये की इस पूरी नदी पर आर पार जाने की लिए एक बहुत बड़ी सीमेंट गारे की 2 मीटर चौड़ी सड़क बनी थी जब हम आए थे वो पूरी सूखी थी।
मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras tour 4 मथुरा वाले का बनारस टूर/ My Banaras tour

                                                           चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य में घास चरता हिरन

नहाते समय जब मेरी नज़र उधर गयी तो देखा कि अभी इस सड़क के ऊपर से भी पानी आने लगा था।  मुझे याद आया की रास्ते में एक बोर्ड पर लिखा था किपानी का स्तर कभी भी बढ़ सकता है सावधानी रखें। हमने तुरंत सावधानी बरतते हुए जल क्रीड़ा का आनंद छोड़, जीवन लीला की तरफ ध्यान दिया और पानी से झटपट निकल कर वापस किनारे पर आ गये। किनारे सूखी जगह पर हमने  चप्पलें उतारी थी।  चप्पल पहनने गये तो पता चला कि पानी इतनी तेजी से बढ़ा था कि हमारी चप्पल अगर हम दो मिनट और न आते तो बह जाती।  वो पानी में गुलुप -गुलुप तो खेलने लग ही गयी थी।
खैर हम राजदारी से निकले तो हमें वहीं दूकानदार ने बताया की पास में ही एक बाँध भी है उसे भी देख लें.। रास्ता समझ के तो निकले थे। लेकिन पता नहीं कैसे भूल कर किसी और ही ओर निकल गये। हम जंगल में और आगे 20 किलोमीटर तक गाडी ले गए जब लगा की हम पहाड़ से उतर रहे हैं पर बाँध का कोई रास्ता या बोर्ड या पथ प्रदर्शक नहीं दिखा तो वहां एक पैदल अम्मा जा रही थी, उससे पूछा उन्होंने बताया की बाँध तो 20 किलोमीटर पीछे है। हमने कहा कि हम तो वहीं राजदारी और देवदरी से आ रहे हैं तो उन्होंने कहा की वहीं बगल से एक रास्ता जंगल जंगल होकर जा रहा है, वो बांध तक जाता है। हम वापस लौटे और बाँध पर भी गये।
और आखिर में .. चन्द्रप्रभा जितनी सुंदर जगह है वहां पहुँचने का रास्ता उससे भी ज्यादा सुंदर है। पता नहीं क्यों पयर्टक इस सुंदर जगह से अछूते रह गये। शायद लोग नहीं आते इसीलिए ये इतनी साफ़ और सुरम्य भी है।
माधव पुलकित प्रसाद
9027353677
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