महासू देवता मंदिर हनोल

By | June 10, 2020
महासू देवता मंदिर हनोल

                                                                  महासू देवता मंदिर हनोल

               

महासू देवता मंदिर हनोल

उत्तराखंड को यूं ही देवभूमि नहीं कहा जाता है। महासू देवता मंदिर हनोल, (Mahasu Devata Mandir Hanol) उनमें से एक है। यहां कदम-२ पर कुदरत ने खूबसूरती इस कदर बिखेरी है, मानों किसी कलाकार ने अपनी कूंची से धरती के कैनवास पर कोई तस्वीर बनाई हो, जो बस बोलने ही वाली हो। महासू देवता मंदिर हनोल बहुत कुछ तस्वीर जैसी ही है, जो देखे बस देखता ही रह जाए।

हिमालय हमेशा से ही ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों की भूमि रहा है। हिमालय की इन्हीं शान्त वादियों में योगी, ऋषि-मुनि अपनी धुनी रमाते हैं और शायद अपनी हर इच्छित अभिलाषा पूरी होने का सौभाग्य पाते हैं।

अगर आप इन गर्मियों में मैदानों की उमस और गर्मी से कहीं दूर पहाड़ों का रुख करना चाहते हैं तो उत्तराखंड के देहरादून का हनोल मंदिर आपके लिए एक बेहतर विकल्प हो सकता है। देहरादून से महज कुछ घंटों की दूरी पर एक ऐसी जगह जहां मौसम साफ़ होने पर हिमालय की चमकती बर्फीली चोटियां साफ़ दिखाई देती हैं।

क्या ख़ास है महासू देवता मंदिर हनोल में ?

भारत के दूसरे हिल स्टेशनों की तुलना में उत्तराखण्ड के देहरादून जिले का हनोल गांव अपेक्षाकृत ज्यादा शान्त और निःसंदेह मनमोहक है। यह जगह खासतौर पर उन लोगों के लिए ज्यादा पसंदीदा हो सकती है जिन्हें भीड़भाड़ अधिक पसंद नहीं।

उत्तराखंड में विकासनगर से ऊपर यमुना और टोंस नदी के बीच का क्षेत्र जौनसार कहा जाता है। जौनसार पर्वतीय क्षेत्र में न्याय के देवता के रूप में प्रसिद्ध महासू देवता के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर से संबंधित महासू देवता का मुख्य मंदिर हनोल गांव में है।

कौन हैं हनोल के महासू देवता ?

महासू महाशिव का ही बिगड़ा हुआ रूप है। महासू एक नहीं बल्कि चार देवता हैं जो आपस में भाई हैं। इनके नाम बासिक महासू, पबासिक महासू, बूठिया महासू (बौठा महासू) और चालदा महासू है। ये सभी भगवान शिव के ही रूप माने जाते हैं। इनमें से चालदा  महासू भ्रमणशील देवता माने जाते हैं।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश समेत पर्वतीय क्षेत्र में महासू न्याय के देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनका मुख्य मंदिर टोंस नदी के पूर्वी तट पर चकराता के पास हनोल गांव में है।

इसके अलावा बिसोई, लखस्याड़ और लखवाड़ में भी महासू देवता के बहुत खूबसूरत मंदिर हैं। हनोल शब्द का संबंध स्थानीय हुना (हुणा) भाट से लगाया जाता है। हनोल का महासू देवता मंदिर अथवा महासू महादेव मंदिर का निर्माण हूण राजवंश के नेता मिहिरकुल हूण ने करवाया था। महासू के न्याय का प्रभाव इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2020 में भी लोग अदालतों में न जाकर न्याय के लिए इसी मंदिर की चौखट पर आते हैं। लोग मानते हैं कि हनोल महासू किसी को भी असंतुष्ट नहीं करते।

महासू देवता के हनोल मंदिर के बारे में

महासू देवता मंदिर हनोल

समंदर की सतह से 1250 मी0 की ऊंचाई पर बना यह मंदिर मिश्रित स्थापत्य शैली में शायद 9वीं शताब्दी में बनाया गया था। जबकि ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग) के रिकॉर्ड में इसे 11वीं या 12वीं शताब्दी का बना बताया गया है।

 

महासू देवता मंदिर हनोल 1 महासू देवता मंदिर हनोल

फिलहाल ASI ही हनोल मंदिर की देखभाल का काम कर रही है। ASI को खुदाई के दौरान शिव-सती, विष्णु-लक्ष्मी, दुर्गा और सूर्य समेत दो दर्जन से अधिक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं मिली हैं। जो हनोल म्युजियम में रखी गयी हैं।

राष्ट्रपति भवन से आता है चढ़ावे के लिए नमक

महासू देवता की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां हर साल चढ़ावे के लिए राष्ट्रपति भवन से नमक आता है। महासू देवता हनोल के मुख्य मंदिर के गर्भगृह में श्रद्धालुओं का प्रवेश वर्जित है। वहां सिर्फ पुजारी ही जा सकता है पर वह भी पूजा के समय।

गर्भगृह में जल की एक धारा निकलती है जिसके स्रोत और निकासी की जानकारी आज भी रहस्य है। इसी जल को भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। इसके अलावा मंदिर में एक अखंड ज्योति भी दशकों से जल रही है।

बिना गारे के बना है महासू देवता मंदिर हनोल

स्थानीय कहानियों के अनुसार लाक्षागृह कांड के बाद पांडव अपनी माता कुंती के साथ यहां कुछ समय तक रुके थे। लाक्षागृह की कहानी जिसमें दुर्योधन पांड़वों को जलाकर मारना चाहता था।

लेकिन पांड़व अपनी माता कुंती के साथ वहां से भागने में सफल होते हैं।  इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने ही देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की सहायता से किया था।

32 कोनों वाले इस मंदिर में पुराने समय की अद्भुत इंजीनियरिंग का नमूना देखने को मिलता है। नींव से लेकर छतरी तक कटे हुए पत्थरों को बिना गारे के एक दूसरे के ऊपर इस तरह रख गया है कि आप आश्चर्य में पड़ जाएंगे।

ऐसा माना जाता है कि हनोल मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी भीम छतरी का पत्थर महाबली भीमसेन घाटा पहाड़ (शिवालिक पर्वत) से ले आए थे।

अहंकार को नष्ट करने वाले महाबली भीम के कंचे

अगर किसी को अपनी ताकत का घमंड हो जाए तो हनोल के इसी मंदिर में महाबली भीम के दो कंचे उठाकर अपनी ताकत की आजमाइश कर सकता है।

कंचों का वज़न 6 मणि 240 Kg और 9 मणि यानि 360Kg है। स्थानीय लोगों के अनुसार अगर पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ साथ गोले उठाए जाएं तो किसी किसी-किसी से उठ भी जाते हैं अन्यथा नहीं।

कब और कैसे जाएं महासू देवता मंदिर हनोल

 

महासू देवता मंदिर हनोल 2 महासू देवता मंदिर हनोल

विकासनगर से हनोल मार्ग

हनोल मंदिर में जाने के लिए मार्च से अक्टूबर तक का महीना सबसे अच्छा माना जाता है। लेकिन मानसून में पहाड़ों पर जाने से बचना चाहिए।

देहरादून से महासू देवता मंदिर हनोल जाने के लिए सड़क के तीन रास्ते हैं। पहला रास्ता देहरादून, विकासनगर, चकराता होते हुए हनोल पहुंचता है। इसकी दूरी करीब 190 किमी0 है। दूसरा रास्ता देहरादून, मसूरी, नैनबाग, पुरोला होते हुए हनोल जाता है। यह दूरी 175किमी0 की है।

तीसरा रास्ता देहरादून, विकासनगर, छिबरौ डैम, त्यूणी से महासू देवता हनोल मंदिर  जाता है। यहां पहुंचने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट की अच्छी व्यवस्था नहीं है। संभव हो तो अपने वाहन से जाएं आप को रोड साइड अच्छे नजारे भी मिल जाएंगे।

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फोटो क्रेडिट -गुगल इमेज एवं नीरज मुसाफिर

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