best time to visit andaman,कहानी सजा-ए-काला पानी की

By | September 13, 2021

My Solo Traveler

Best time to visit andaman 

अंडमान कब जाना चाहिए?

अंडमान कब जाना चाहिए best time to visit andaman इस सवाल के एक से ज्यादा जवाब हो सकते हैं। इसका एक जवाब हम देने का प्रयास कर रहे हैं। हमारे एक मित्र हैं, नाम है दिवस मिश्रा। मिश्रा जी आला दर्जे के घुमक्कड़ हैं। साल 2018 में उन्होने अंडमान की यात्रा की। उनकी यात्रा को हम mysolotraveler.com पर पब्लिश कर रहे हैं। हमारे अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि अक्टूबर से मई के बीच के महीने यहां जाने के लिए सर्वोत्तम हैं।

अंंडमान का नाम सामने आते ही मेरे सामने जो पहली तस्वीर आती है, वो है सजा-ए- कालापानी की तस्वीर सामने आ जाती है। लेकिन दिवस भाई की इस संस्मरण के बाद अंडमान के बारे में बहुत कुछ नया जानने को मिला। अंडमान भारत ही नहीं दुनिया के सबसे खूबसूरत स्थलों में से एक है जहां आप एक से ज्यादा बार जाना पसंद करेंगे।

मेरी अंडमान यात्रा My Andman Trip

तुम न समझो, देश की स्वाधीनता यों ही मिली है,
हर कली इस बाग़ की, कुछ खून पीकर ही खिली है।
मस्त सौरभ, रूप या जो रंग फूलों को मिला है,
यह शहीदों के उबलते खून का ही सिलसिला है।
बिछ गए वे नींव में, दीवार के नीचे गड़े हैं,
महल अपने, शहीदों की छातियों पर ही खड़े हैं।
नींव के पत्थर तुम्हें सौगंध अपनी दे रहे हैं
जो धरोहर दी तुम्हें,
वह हाथ से जाने न देना।
देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना।।

नीले-हरे समंदर और सफे़द बालू वाले तट 

कायदे से होना तो यह चाहिए था कि श्रीकृष्ण सरल की यह कविता हर बच्चे को मुँह जुबानी याद होती। उसे अपने देश के शहीदों पर गर्व होता। पर आजकल के बच्चों को शीला की जवानी और सल्लू के डायलॉग,और स्तरहीन न्यूज चैनल से आगे देखने-सुनने की फुरसत कहाँ। हमने अपने बच्चों को विरासत में ऐसा ही संस्कार दे रखा है, जितना पैसा हम उसके खिलौने,फिल्मों और फास्ट फूड पर खर्च करते हैं उसी पैसे से हम चाहें तो उसे अपने देश से परिचित करा सकते हैं । तैयार हो जाइए आपको हम ले चलते हैं,अंडमान निकोबार द्वीपसमूह। देश का वह भाग जिसके नीले-हरे समुद्र और सफेद बालू वाले समुद्र तट पर जाने के बाद आप खुद को भी भूल जाते हैं।

अंडमान और लक्षद्वीप के बारे में मुझे बचपन में पता चला और सौभाग्य से उसी दौरान खूब सारी पुस्तिकाएँ पढ़ने को मिलीं जिनमें चिड़ियों से लेकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और काला-पानी की सजा पाने वाले वीरों की दिनचर्या और उनके संघर्षों का वर्णन था |
अब मुझे अंडमान के बारे में बहुत सी बातें पता थीं, पर जिज्ञासा भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती। ‘क्या-क्या नहीं सहा सावरकर ने’ ‘खड़ी-बेड़ी की सजा’ तथा क्रांतिकारी उल्लासकर दत्त के संघर्षों को पढ़कर आयरिश जेलर ‘बारी’ से नफरत होने लगती थी।

अंडमान की सजा को काले पानी की सजा क्यों कहा जाता था?

पुस्तक की पंक्ति मुझे अभी भी याद आती है-” आकाश में बादलों तथा घने वृक्षों के कारण सूर्य की किरणें धरती पर पहुंच ही नहीं पाती थीं जिससे धरती पर अंधेरा छाया रहता था और पानी काले रंग का प्रतीत होता था,जिसके कारण इसे काला पानी कहा जाने लगा। कैदियों को लकड़ी काटने और  खाने  लिए घास काटने जंगल जाना पड़ता था,जहां पेड़ के पत्तों से जोंक गिरते और लहूलुहान कर देते थे, यदि कोई कैदी भाग जाए तो आदिवासी अपने विष बुझे बाणों से उसे चिरनिद्रा में सुला देते।”

 सेलुलर जेल भारत का सबसे बड़ा तीर्थ

श्रीकृष्ण सरल जी की यह कविता ऐसे ही क्रांतिकारियों को समर्पित है जिनके नाम आज भी सेलुलर जेल की दीवारों पर लिखे हुए हैं। वीर सावरकर के भाई गणेश वासुदेव सावरकर जो स्वयं यहाँ कैदी थे उन्होंने इसे भारत का सबसे बड़ा तीर्थ कहा।  जिस सेलुलर जेल में भारत के सपूतों को कठोर यातनाएं दी गयी उसे निसंदेह भारत का महान तीर्थ होना चाहिए।

कब और कैसे बना प्लान

2018 के रक्षाबंधन पर मैंने निश्चय किया कि इस बार बहन को गिफ्ट के रूप में अंडमान की यात्रा पर ले चलूँ और इस तरह भारत सरकार की ‘यात्रा रियायत अवकाश’ सेवा का लाभ लेकर आने-जाने की टिकट बुक कर ली। पूर्व में अंडमान की सुखद यात्रा कर चुके सहकर्मियों से इस संबंध में विचार विमर्श किया तो उन्होंने ट्रेवल एजेंट का नम्बर दिया,और साथ ही यात्रा के विषय में अपने अमूल्य सुझाव दिए जिसके बिना इस यात्रा का पूर्ण होना संभव नहीं था। एक प्रोफेशनल की तरह एक हाथ से एजेंट ने पूरा भुगतान लिया और दूसरे से होटल बुकिंग और पैकेज दिया ।
अब हम एजेंट के रहमो-करम थे,यात्रा की सारी व्यवस्था उसी के जिम्मे थी ,मेरी खरीददारी पूरी हो चुकी थी ,बहन ने मम्मी और पापा के साथ सारी पैकिंग कर ली |  जब 2500 किलोमीटर दूर एक अनजान टापू पर जाना हो तब वहाँ होने वाली समस्याओं से पूर्व परिचित होना उन्हें टालने की दिशा में एक अच्छा कदम होता है |
मैंने अंडमान पर वीडियो देखे ,हिंदीसमय डॉटकॉम पर उपलब्ध रामजी शुक्ल का यात्रा वृत्तांत – ‘तो अंडमान आखिर किसका देश है…?’ , श्री प्रकाश शुक्ल का यात्रा वृत्तांत ‘अंडे से अंडमान ‘ और वीर सावरकर का उपन्यास काला पानी पढ़ डाला | अंडमान में सेवा दे चुके सीनियर अरुण झा सर से इस सम्बन्ध में बात की तो उन्होंने आपात स्थिति में हर प्रकार की सहायता उपलब्ध करने का आश्वासन दिया |

13 सितंबर 2018 को आखिर हम निकल पडे़ अंडमान

सुबह 6 बजे की फ्लाइट से चेन्नई होते हुए पोर्ट ब्लेयर जाना था, यदि नींद के आगोश में एक फ्लाइट छूट जाती तो पूरी प्लान ख़राब हो जाता इसलिए हम रात 2  बजे ही एयरपोर्ट को रवाना हो गए | हमारी फ्लाइट दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल-3 से थी, दिल्ली एयरपोर्ट का निर्माण GMR नामक कंपनी ने किया है और एयर इंडिया तथा विस्तारा की  समस्त फ्लाइट T-3 से ही चलती हैं, चूंकि मेरा ऑफिस भी एयरपोर्ट पर है अतः मुझे एयरपोर्ट और फ्लाइट से संबंधित सभी नियमों की जानकारी थी। रात में सो न पाने की वजह से मम्मी और बहन पर इसका प्रभाव अगले दिन दिखाई दिया। कॉफी पीकर बोर्डिंग पास लेते और घूमते हुए आख़िरकार वह समय आ ही गया जब बोर्डिंग प्रारंभ हुई।
अभी किसी अलसाये से बच्चे की तरह सूरज भाई बिस्तर पकड़े रहने की जिद कर रहे थे, और उनकी मम्मी “उठो लाल अब आंखे खोलो,पानी लायी मुँह धो लो” सुना रही थीं, इधर मेरी माता जी एयरोब्रिज से होते हुए विमान में सवार हो रही थीं। विंडो सीट पर कब्जा जमाते हुए जब थोड़ा पीछे की ओर विमान के डैनों को देखा तब उन्हें पता चला कि किसी अत्याधुनिक बस में न होकर वह विमान में ही सवार थीं।
क्रू मेंबर्स ने सीट बेल्ट बांधने का अनुरोध किया और विमान चेन्नई शहर की ओर उड़ निकला। एयरपोर्ट पर आते ही हमारा मोबाइल कैमरे में तब्दील हो चुका था,और पूरे सफर में इसे अब यही भूमिका निभानी थी, क्योंकि सिवाय BSNL और एयरटेल के अंडमान अन्य ऑपरेटरों की सेवा तब उपलब्ध नहीं हो पायी थी। ज्यों-ज्यों विमान ऊपर की ओर उड़ता, दिल्ली की इमारतें छोटी होती जाती थीं और हमारे वीडियो में तैरते पर्वताकार कपासी मेघ और उगता सूरज खूबसूरती से कैद हो रहे थे। हल्के-फुल्के टर्बुलेन्स के बाद कैप्टन ने सूचित किया कि अब हम 11000 फिट की ऊँचाई पर हैं।
इस ऊँचाई से देखने पर स्तरी मेघ नीचे दिखाई देते थे। एयर इंडिया के विमान में नाश्ता करने के उपरांत दीक्षा को नींद आ गयी और जब नींद खुली तो उसने पाया कि वह किसी नदी के ऊपर उड़ रही है और ऊपर पक्षाभ मेघ बिखरे पड़े हैं। अब उस नदी के नाम पर चर्चा होने लगी जो वास्तव में स्तरी या कपासी मेघ थे। जलपान के पश्चात हम चेन्नई विमानपत्तन पर लैंड हो रहे थे। समुद्र से घिरा शहर मनोरम प्रतीत हो रहा था,पर हमारे पास बाहर घूमने के लिए समय की कमी थी।
विमान ने चेन्नई में लैंड किया और हम उतर गये अब अगली फ्लाइट 2 घंटे बाद थी, तकनीकी भाषा में इसे ले-ओवर बोलते हैं। चूंकि सामान हमारा पोर्ट ब्लेयर तक के लिए चेक-इन हो चुका था और चेन्नई से अंडमान यात्रा का बोर्डिंग पास भी मिल चुका था अतः हमें सिर्फ बोर्डिंग टाइम की घोषणा का इंतजार था, जो बार-बार कैंसिल हो रही थी 3 घंटे निकल चुके थे और फ्लाइट का कोई अता-पता नहीं था, चेहरे पर उत्साह की जगह मायूसी ने ले ली
शेष अगली पोस्ट में…
विशेष:- वर्ष 2018 से ही आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत BSNL ने अंडमान- निकोबार में दूरसंचार सेवाओं के विकास हेतु देश की सबसे लंबी समुद्री ऑप्टिकल केबल बिछाने का कार्य शुरू किया था जिसका प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी  जी ने 10 अगस्त, 2020 को उद्घाटन किया।चेन्नई एवं पोर्ट ब्लेयर को जोड़ने वाली लगभग 2300 किलोमीटर लम्बी सबमरीन ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी) से पोर्ट ब्लेयर को 400 मेगाबाइट पर सेकंड एवं अन्य द्वीपों को 200 मेगाबाइट प्रति सेकंड की स्पीड मिलेगी।
अब जबकि अंडमान में संचार व्यवस्था दुरुस्त हो जाएगी (4G और 5G) तो आने वाले समय में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा ।  अंडमान में अभी टूरिज्म सिर्फ 2-3 द्वीप पर ही है अभी भी उत्तरी अंडमान में डिगलीपुर जैसे द्वीपों के पास टूरिज्म की अच्छी संभावनाएं हैं। इस परियोजना से भारतीय नौसेना भी काफी लाभान्वित होगी और इंटरनेट से जुड़ाव के कारण अंडमान में वाणिज्यिक बन्दरगाहों का विकास संभव हो सकेगा।

चेन्नई से अंडमान और सेलुलर जेल

celular jail in Hindi

चेन्नई में एक घंटे का ठहराव था, परन्तु एयर इंडिया की कृपा से बोर्डिंग ढ़ाई घंटे बाद ही हो सकी। अभी वीर सावरकर विमानपत्तन दो घंटे की दूरी पर था,और विमान कितना भी तेज चले बोर्डिंग में हुई देरी की भरपाई नहीं कर सकता था।उसका खामियाजा अब हमें अपने खाने-पीने और आराम करने के समय में कमी करके ही करना था।
एयरपोर्ट के नाम से मुझे आश्चर्य हुआ, सावरकर स्वतंत्रता संग्राम के सबसे विवादित क्रांतिकारी रहे हैं। वामपंथी, हिन्दू महासभा में उनके योगदान और अंग्रेजों को माफीनामा लिखने में उनकी भूमिका को उनके संघर्षों से ज्यादा महत्व देते हैं और उन्हें हाशिये पर रख देते हैं। ऐसे में जब 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने पोर्ट ब्लेयर विमानपत्तन का नाम वीर सावरकर के नाम पर किया तो यह एक महान क्रांतिकारी को सच्ची श्रद्धांजलि थी। जिसने एकांत कारावास का दंड सहते हुए भी खुद को टूटने नहीं दिया।
एक बार फिर विमान 11000 फीट की ऊंचाई से नीचे आने को तैयार हो रहा था,और हम सब छोटे-छोटे हरे -भरे द्वीपों के ऊपर से गुजरते हुए अपूर्व आनंद का अनुभव कर रहे थे,  मन कहता था लैंडिंग में थोड़ी और देरी हो जाये। द्वीपों के ऊपर उड़ते हुए बादल और उसके ऊपर हम, यह  बेहद रोमांचक लग रहा था। वीर सावरकर एयरपोर्ट के बाहर निकले तो हमारे एजेंट हाथ में प्लेकार्ड लिए खड़े मिल गये और अन्य सभी यात्रियों की तरह हम भी होटल को रवाना हो गये।
रास्ते में ड्राइवर को ही गाइड का भी काम मिल गया और अंडमान के इतिहास, भूगोल और नृजातीय शास्त्र पर वार्ता प्रारंभ हो गयी। सबसे पहले ड्राइवर के इतिहास पर बात प्रारंभ हुई कि वह किस तरह आंध्र प्रदेश से यहाँ पहुंचा, फिर जमीन के दाम और रोजगार के मुद्दे पर आते-आते होटल आ गया। पहले तो हमें लगा की यहाँ जमीं सस्ती होगी पर दाम सुनकर होश फाख्ता हो गए।  हमारे पास सिर्फ आधे घंटे का समय था और फिर कुख्यात सेलुलर जेल का भ्रमण करने जाना था।

दिल मोह लेने वाले नज़ारे

नियत समय पर तैयार होकर हम चल निकले, कहीं कोई ट्रैफिक न प्रदूषण,चारों तरफ हरियाली ही हरियाली। नारियल और सुपाड़ी के बागान सड़क के किनारे भूदृश्य को मनोरम बना रहे  थे, मन होता था कि यहीं बस जाएं। अंडमान में बसना इतना आसान नहीं रहा, कहा जाता है कि यहाँ के आदिवासी दुनिया के प्राचीनतम आदिवासी हैं, और निकोबार के सेंटिनली आज भी दुनिया से कोई संबंध नहीं रखना चाहते
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात अंग्रेजों ने विद्रोहियों को सजा के रूप में अंडमान से लेकर गुआंतानामो तक तमाम ऐसे एकांत द्वीपों पर निर्वासित कर दिया जहाँ से जीवित वापस लौटना संभव ही नहीं था। यहां 1857 में सजा के रूप में 200 क्रांतिकारियों का पहला जत्था भेजा गया था ,बाद में फिर पूरे भारत से उन क्रांतिकारियों को इस नर्क में भेजने का सिलसिला चल निकला जिन्हे अंग्रेज मृत्युदंड नहीं दे पाते थे, काला पानी का मतलब था मौत से अधिक भीषण यंत्रणा सहना।
कभी सात भुजाओं वाले, दैत्याकार सेलुलर जेल  की तीन भुजाएँ अभी भी शेष हैं, चार को स्वतंत्रता उपरांत गिराकर अस्पताल बना दिया गया है। 1897 में बनाई गई इस जेल की हर ईंट शहीदों के लहू से रंगी है। पहले वाइपर द्वीप पर जेल बनायी गयी फिर एक दूसरी जेल पोर्ट ब्लेयर में। जेलर और अधिकारी सामने बसे रॉस आइलैंड जिसका नाम मोदी जी ने बदलकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वीप कर दिया है में रहते थे।
दोनों आमने सामने पर दोनों में धरती-आसमान का अंतर था। सेलुलर में नहाने के लिए दो कप पानी मिलता, कोल्हू पेरकर 30 पौंड  (यानि 30.600किलोग्राम) नारियल तेल निकालने जैसा असंभव कार्य व खाने को 2 सूखी रोटी,और अनगिनत कोड़े मिलतें वहीं रॉस में अधिकारियों के आलीशान बंगलों और सुंदर बीच पर पार्टियां होती, मिनरल वॉटर और सुगंधित व्यंजन परोसे जाते । एक सभ्यता का उच्चतम शिखर था दूसरा उसके निर्मम शोषण और दमन का प्रतीक।
हाड़तोड़ मेहनत,अमानवीय दंड और खाने को रूखा-सूखा, पहनने को टाट की बोरी और कष्टप्रद मौसम भला कोई कितने दिन इसमें जीवित रह सकता था। जेल की दीवारों पर स्वतंत्रता सेनानियों के नाम अंकित थे जिन्हें सिर्फ फाँसी ही इस नारकीय यातना से मुक्ति दिला सकती थी। सावरकर Vinayak Damodar Savarkar, की बैरक आखिरी कोठी थी एकदम एकांत में और उसके नीचे सामने की तरफ फाँसीघर था। जेल की भुजाएँ इस प्रकार बनी थीं कि कभी भी एक बैरक वाले दूसरे को न देख पाएं। खुद सावरकर को वर्षो बाद ही पता चल पाया कि उनके भाई भी इसी जेल में हैं।

साल 1979 में देश को समर्पित की गयी सेलुलर जेल

1979 में मोरारजी देसाई ने इस जेल को राष्ट्र को समर्पित कर दिया। जेल के सामने पार्क में इंदुभूषण सिंह, बाबा भान सिंह, पंडित रामरखा, महावीर सिंह Mahavir Singh:मोहित मोइत्रा, मोहन किशोर इत्यादि शहीदों की प्रतिमाएं हैं। जिन्होंने जेल के अंदर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई और प्राणोत्सर्ग कर दिए ताकि राजनीतिक कैदियों के साथ मानवीय सुलूक हो सके।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियाँ मस्तिष्क में उमड़ने लगीं –
जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

 शहीदों को श्रद्धांजलि देकर हम कर्बियन कोव बीच को रवाना हो गए। सेलुलर जेल और म्यूजियम देख कर हम लोग बाहर आये क्योंकि नाइट शो की तैयारी के लिए दर्शकों को प्रांगण से बाहर कर दिया जाता था।

यहीं मेरी बहन और मम्मी को पहली बार समुद्र के दर्शन होने थे। इन सब के बीच सभी को भूख लग गयी थी, पर कहीं नाश्ता करने का समय ही नहीं मिल पाया। भूख से दीक्षा चिड़चिड़ी हो गई थी, उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसने फोटो खींचने से भी इंकार कर दिया। जेल में खूब सारी छुईमुई थी, अब दीक्षा भी उसमें से एक हो गई थी। किसी तरह उसको मनाया और माफी मांगा, पर अब तो सफर में यह फिर से होना ही था।

अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें वातावरण को लालिमा से भर रहीं थी। काले-भूरे स्तरी बादल उन किरणों को रोकने की कोशिश कर अपनी कालिमा व्याप्त करने को आतुर थे। बीच के सामने दूर समुद्र में एक छोटा सा द्वीप मासूम बच्चे सा लग रहा था।  तकरीबन 100 फुट लंबे फ्लोटिंग ब्रिज से जेट स्की लहरों में उछलते हुए सैलानियों को द्वीप के पास तक ले जाती और फिर वापस तट पर लाकर छोड़ देती।

दीक्षा, मम्मी और पापा सभी समुद्र को देखकर उत्साहित हो रहे थे, और भटक कर आई लहरों को पुचकार रहे थे, परंतु मुझे कर्बियन कोव बिल्कुल भी अच्छा न लगा। भूरी-काली रेत या फिर किसी प्रदूषण के कारण यह मेरी उस धारणा के विपरीत था जो मैंने राधानगर बीच के बारे में बनाई थी।
नारियल के पेड़ों से घिरे अर्धचंद्राकार बीच पर शाम होने लगी थी और अब हमें वापस लाइट एन्ड साउंड शो देखने  सेलुलर जेल जाना था। गाड़ी में बैठते ही बारिश ने हमारा स्वागत किया और डर भी लगा कि यदि बारिश होती रही तो ओपन एयर शो का क्या होगा।
जेल प्रांगण में खड़ा पीपल का पेड़, म्यूजियम और शाम 6 बजे ओम पुरी की आवाज में लाइट एंड साउंड शो उन जुल्मों को विस्तार से बयां करते हैं, जिन्हें सुनकर रूह कांप जाती है।
शो देख कर ऐसा लगा कि अभी भी शहीदों की चीत्कारें इस परिसर में गूंज रही हैं। आंखों की कोरें भीग चली थीं, याद आ रहा था-“शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले”… यह उन शहीदों का ही बलिदान था कि बर्मा, थाईलैंड और मलेशिया से महज 200 किलोमीटर दूर होते हुए भी यह हमारे देश का अभिन्न अंग है।

बातें अंडमान के अतीत की

अंडमान प्राचीन काल से ही भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के मध्य के व्यापारियों को ज्ञात एक विश्राम स्थल था। 1788 में आर.एच्.कोलब्रुक तथा आर्किबाल्ड ब्लेयर यहाँ सर्वेक्षण हेतु आये तो उन्होंने इसे सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पाया, फलस्वरूप इस द्वीप पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए अंग्रेजों को यहाँ के आदिवासियों से लंबा संघर्ष करना पड़ा।
1858 में जहां ग्रेट अंडमानी 3500 से अधिक थे अब इनकी संख्या महज दहाई अंको में है। ओंगे और जारवा की स्थिति में इनसे ज्यादा अच्छी नहीं है। शाम की रोशनी में सेलुलर जेल का मुख्य द्वार नहाया हुआ था, महज 10 फुट ऊंची चहारदीवारी देख कर कोई नहीं कह सकता कि वर्षों तक इसे कोई इससे भाग न पाया।
नारियल पानी पीकर हमने ड्राइवर को फोन किया और अंडमान के रहन-सहन के बारे में बात करते होटल तक आ गए। होटल शहर से दूर एकांत पहाड़ी के पास था। छोटा सा लॉन और उस पर पड़ा झूला झूलते हुए हमें महसूस हुआ कि फोन का बन्द हो जाना भी सुकून देता है।
अब तक डिनर का वक्त हो चुका था, इतनी थकावट के बाद मनपसंद भोजन मिला तो हम सबने इसका भरपूर फायदा उठाया। इटेनरी के मुताबिक हमें सिर्फ ब्रेकफास्ट और डिनर दिया जाना था, लंच की व्यवस्था स्वयं करनी थी। डिनर करके निकले तो हमारे टूर कोर्डिनेटर रिसेप्शन पर ही मिल गए और अगले दिन का प्रोग्राम समझाते हुए हमें हैवलॉक का फेरी टिकट और वहाँ के एजेंट का नंबर दिया और साथ ही सुबह 7:30 पर तैयार रहने की हिदायत भी दी।

अगला पड़ाव हैवलॉाक द्वीप था, जिसे अब स्वराज द्वीप कहा जाता है।

सुबह सात बजे ड्राईवर ने सूचित किया कि सारी पैकिंग कर हमें हैवलॉक के लिए निकलना है,और फिर हमने मिल्क पाउडर से बनी चाय पीकर ब्रेकफास्ट में सैंडविच और फ्रूटी पैक कराकर जेट्टी पकड़ने चल निकले।
रास्ते मे अंडमान में होने वाली खाद्य आपूर्ति पर चर्चा चली तो उन जहाजों का जिक्र हुआ जिनसे चेन्नई के रास्ते अंडमान में राशन आता है और अंडमान की अर्थव्यवस्था चलती है।
टर्मिनल पर पहुंचे तो ओसियन ग्रीन 1 की बोर्डिंग में समय बाकी था। रिपोर्ट किया और फिर जब बोर्डिंग शुरू हुई तो जेट्टी पर बैठे, निर्धारित समय पर जेट्टी स्वराज (हैवलॉक) द्वीप की ओर रवाना हो गयी। नील, हैवलॉक, कैम्पबेल इन सबके नाम से मुझे नफरत थी क्योंकि इन्होंने प्रथम स्वाधीनता संग्राम का निर्दयता से दमन किया था, गांवों को घेरकर आग लगा दी थी।
निर्दोष मासूमों को सरेराह फाँसी पर लटका दिया था, और अंग्रेजों ने इनको अपना नायक मानकर इनके नाम पर द्वीप और खाड़ी के नाम रख दिये। बाद में माननीय प्रधानमंत्री जी ने इन नामों को बदलते हुए इन्हें सुभाषचंद्र जी का दिया हुआ नाम शहीद और स्वराज दिया।
ओसियन ग्रीन खुले छत वाली जेट्टी थी ,जिस पर डांस और फोटोशूट करने को सभी उतावले हो रहे थे,सुंदर संगीत,मनमोहक समुद्री लहरें और दूर स्थित हरे पहाड़ ऐसा नजारा देख भला किसके न पांव थिरक जाएं।
नाश्ता करके सब डेक पर आ गए और फिर मम्मी अथाह जल राशि वाले काले समुद्र को देख कर हमें बता रही थीं कि देखो इतना काला पानी है इसी से सब अंडमान को काला पानी कहते थे। सूरज की जगमग किरणें इसे और काला बना रही थीं और क्रूज इसे छूकर धवल श्वेत कर रहा था, एक ही सिक्के के दो विपरीत पहलू थे या आँखों का भ्रम था,भला कौन जाने?
थोड़ी देर में उद्घोषणा हुई कि सब अपना -अपना स्थान ग्रहण कर लें, तूफान आने के पहले सभी सुरक्षित बैठ चुके थे। डेक पर सिर्फ सिक्योरिटी टीम थी।
काले बरसाती बादलों ने क्रूज को पार किया और हम कॉफी पीते, फ़िल्म देखते आगे के सपनों को बुनते रहे। स्वराज द्वीप आ चुका था, उतर कर देखा तो पारदर्शी पानी, तैरती मछलियाँ और कछुए, तट पर पड़ी नौका और पास ही मैंग्रोव ; लगा वाकई वह जगह आ गयी जिसकी तलाश में खिंचे हम इतनी दूर आए।
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                                                                                मैंग्रोव

द्वीप को देखकर इतना आनंद आ रहा था कि हम भूख-प्यास भूलकर फोटोशूट में मग्न हो गए और जब सामान लेकर पोर्ट से बाहर निकले तो हतप्रभ… किसी के प्लेकार्ड पर मेरा नाम नहीं। यात्री अब गिनती के ही बचे थे इतने में एक सज्जन ने मुझसे पूछा आपको अनिल जी ने भेजा है, मेरे हाँ कहने पर हम दोनों मुस्कुरा उठे, दरअसल उन्होंने गलती से दिवस को देवाशीष समझ लिया था और इसी नाम का प्लेकार्ड बना लाये थे। अब हम एल्डोरोडो की ओर चल निकले थे।
अंडमान का यह संस्मरण आपको कैसा लगा हमें कमेंट करके जरूर बताएं। हम इसका दूसरा भाग भी आपके लिए ले आएंगे।

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