chittorgarh-fort का इतिहास क्या है

By | October 9, 2020

Chittorgarh-fort का इतिहास क्या है..

चित्तौड़गढ़ फोर्ट, पुराने राजस्थान की ऐतिहासिक राजधानी

History of chittorgarh fort in hindi

Time Capsule kya hai/टाइम कैप्सूल क्या है

चित्तौड़गढ़ फोर्ट chittorgarh-fort यानी वो किला जिसने पूरे राजपुताने का गौरव अपने माथे पर सजाया था। चित्तौड़गढ़ वो किला जिसे मेवाड़ की राजधानी बनने का गौरव सबसे ज्यादा समय तक मिला। चित्तौड़गढ़ जिसकी अभेद दीवारे तोड़कर कोई भी तोप, गोला-बारूद उसे फतेह नहीं कर पाया अगर अपवाद के रूप में कुछ मौके छोड़ दें।

जब तक चितौड़गढ़ किले की दीवारें महफूज़ थी, तब तक आप दुनिया के सबसे सुरक्षित किले में खुद को महसूस कर सकते थे। फर्ज कीजिए यदि आप 15वीं और 16वीं सदी में होते तो यह किला आपके लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह होती।

700 एकड़ के एरिया में फैला यह किला 180 मी0 खड़ी पहाड़ी पर बनाया गया है। इस किले की परिधि 13 किमी है। खड़ी चढ़ाई पर बनाया गया यह किला बाकी पहाड़ियों से अलग है। इस कारण दुश्मन का यहां पहुंचना नामुमकिन हो जाता था।

चित्तौड़गढ़ का यह किला साहस, वीरता, शौर्य और देशप्रेम का साक्षी रहा है। चितौड़गढ़ किले ने देश पर मर मिटने वाले असंख्य रणबांकुरे भी देखे हैं जिन्होंने तुलजा भवानी की शपथ लेकर अपना जीवन बलिदान कर दिया। इस किले ने महारानी पद्मिनी का जौहर भी देखा है। चितौड़गढ़ ने राणा कुम्भा का साहस, और महाराणा प्रताप की अपौरुषेय वीरता, उनकी तलवार की चमक और चेतक की स्वामिभक्ति देखी है।

वहीं दूसरी ओर अलाउद्दीन खिलजी की मक्कारी और राजमहल में चलने वाली बनवीर की साजिश का गवाह भी रहा है। पन्ना धाय की ममता और कर्तव्यनिष्ठा भी देखी है कि कैसे एक धाय ने अपने बेटे की बलि सिर्फ लिए चढ़ा दी कि राजपुताने का दीपक जलता रहे।

हम चित्तौड़गढ़ के उस महान किले की कहानी बताने का प्रयास करेंगें  जिसकी दीवारों से टकराकर विदेशी आक्रमणकारियों के हौसले पस्त होते रहे और चित्तौड़गढ़ पूरी शान के साथ सीना ताने खड़ा रहा। राजस्थान में कुल 84 किले हैं। इनमें से एक कुंभलगढ़ किले के बारे में हम पिछली पोस्ट kumbhalgarh-fort-history-in-hindi  में बता चुके हैं। इन 84 किलों में से तकरीबन 32 का निर्माण या जीर्णोद्धार राणा कुंभा ने करवाया था।

chittorgarh-fort का इतिहास क्या है

एशिया के सबसे बड़े किले चित्तौड़गढ़  की कहानी

चित्तौड़गढ़ वो किला था जिसे जीतने का मतलब था कि दुश्मन ने मेवाड़ पर फतेह हासिल कर ली। किले के अंदर सात दरवाजे हैं। इन दरवाजों को पोल कहा जाता है।

1.पाड़न पोल

2.भैरव पोल

3.हनुमान पोल- हनुमान पोल के पास हनुमान जी का मंदिर है। स्थानीय लोग कहते हैं कि यहां हनुमान जी की मूर्ति बहुत चमत्कारिक है।

4.गणेश पोल 

5.जोड़ला पोल – क्योंकि 5 और 6 नंबर के पोल आसपास है तो इस वजह से 5वें पोल को जोड़ला पोल कहा जाता है।

6.लक्ष्मण पोल– इस पोल के पास लक्ष्मण जी का छोटा सा मंदिर है।

7.राम पोल– लक्ष्मण पोल से आगे बढ़ने पर एक पश्चिम की तरफ एक पोल आता है। इसे राम पोल कहा जाताहै। यह किले का सातवां और अन्तिम प्रवेश द्वार है। बाहर से आने वाली सड़क यहां आकर समाप्त हो जाती है।

इसी पोल के पास महाराणाओं के पूर्वज माने जाने वाले सूर्यवंशी भगवान श्री रामचन्द्र जी का मंदिर है। सिसोदिया सूर्यवंश की ही एक शाखा है। भगवान राम का यह मंदिर भारतीय स्थापत्य कला एवं हिन्दू संस्कृति का बेजोड़ नमूना है। दरवाजे के एक तरफ आबादी और दुसरी तरफ किले के अंदर की इमारतें हैं।

Chittorgarh-fort का इतिहास क्या है

चित्तौड़गढ़ किले को एशिया का सबसे बड़ा किला माना जाता है। इसे सबसे बड़ा Living fort भी माना जाता है। इस किले का निर्माण इतिहासकारों के अनुसार सातवीं शताब्दी में  माैर्य वंश के शासक चित्रांगद ने करवाया था। बाद में सिसोदिया वंश के शासक  बप्पा रावल  ने 738 ई0 में मौर्य वंश के आखरी राजा को हराकर चित्तौड़गढ़ को अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद चित्तौड़गढ़  मेवाड़ की राजधानी बन गया औऱ आने वाली शताब्दियों तक राजपूतों के पास रहा।

 

chittorgarh-fort का इतिहास क्या है

                                                                                      चित्तौड़गढ़ का महान किला

Chittorgarh-fort क्यों प्रसिद्ध है

चित्तौड़गढ़ का किले यानि chittorgarh-fort का इतिहास क्या है. यह किला अपनी अद्भुत बनावट के कारण आश्चर्य से भर देता है। आसपास की पहाड़ियों से कटे हुए एक ऊंचे खड़ी ढ़ाल वाले पहाड़ पर उत्तर से दक्षिण दिशा में यह किला बना हुआ है। कुछ प्रचलित दंतकथाओं के अनुसार इस किले को दूसरे पांडव महाबली भीमसेन ने एक रात में बनाया था। कहा जाता है कि जब वनवास की अवधि में पांडव युद्ध की तैयारी में लगे थे तो उन्हें धन की आवश्यकता पड़ी। ऐसे में एक सिद्ध साधु से भीम ने पारस पत्थर मांगा। साधु ने कहा ठीक है लेकिन इसके लिए उन्हें यानि भीम को एक रात में सूर्योदय से पहले इस पहाड़ पर किले का निर्माण का कार्य करना पड़ेगा।

भीम ने भाइयों की सहायता से तकरीबन किले का निर्माण कर दिया था, सिर्फ दक्षिणी हिस्से का काम बाकी था। साधु पारस पत्थर देना नहीं चाहता था इसलिए उसने अपने एक चेले को मुर्गे की बांग निकालने का आदेश दिया। आवाज सुनकर भीमसेन ने काम बंद कर दिया और गुस्से में अपना पैर जमीन पर मारा जिससे पानी का सोता निकल आया इसे आज लत-तालाब के नाम से जानते हैं।

Chittorgarh-fort किसने बनवाया था ?

इतिहासकारों के मुताबिक चित्तौड़गढ़ किला सातवीं सदी में मौर्य वंशीय राजा चित्रांगद ने बनवाया था।  जो बाद में चित्तौड़ के नाम से जाना जाने लगा। 8वीं शताब्दी में इसे बप्पा रावल ने जीत लिया। इस तरह कुल 834 सालों तक सिसोदिया वंश के पास रहा। सन् 1568 में इस किले को अकबर ने जीत लिया। अकबर के समय में चित्तौड़गढ़ किले को बुरी तरह लूटा गया था।

महारानी पद्मावती के जौहर की कहानी

चित्तौड़गढ़ का किला महारानी पद्मावती के जौहर का गवाह रहा है, जहां उस महान रानी ने राजपूती मान-मर्यादा और अपने सतित्व की रक्षा के लिए हजारों वीरांगनाओं के साथ जौहर कर लिया था। स्त्रीलोलुप अलाउद्दीन रानी की परछाई को भी छू नहीं पाया था।

महारानी पद्मावती वही रानी थी जिनके ऊपर मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्ममावत नाम से महाकाव्य लिखा था। इन्हीं महारानी पद्मावती पर संजय लीला भंसाली ने विवादास्पद फिल्म पद्मावत बनाई थी। जिसका राजस्थान की करणी सेना ने कड़ा विरोध किया था। विवाद के कारण ही बाद में फिल्म का नाम बदल कर पद्मावत कर दिया गया।

इस किले ने रानी कर्मवती का भी जौहर देखा है जब चित्तौड़गढ़ पर गुजरात के शासक बहादुरशाह ने आक्रमण कर दिया। रानी कर्मावती राणा सांगा की विधवा थी। वह राणा विक्रमादित्य और राणा उदय सिंह की माता भी थी। वह महाराणा प्रताप की दादी थी। राणा सांगा की मृत्यु के बाद गुजरात के शासक बहदुरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण दिया।

उस समय मेवाड़ की स्थिति ठीक नहीं थी, ऐसे में रानी कर्मावती ने मुगल शासक हुमायूं को संदेश के साथ राखी भी भेजी थी। लेकिन हुमायूं के आने में देर होने पर रानी कर्मावती ने महल की स्त्रियों के साथ 8 मार्च 1535 को जौहर कर लिया।

किले का तीसरा जौहर रानी फूलकुंवर ने अकबर के समय में किया था। चित्तौड़गढ़ फोर्ट से मीराबाई का संबंध भी है। चित्तौड़गढ़ का किला वही किला है जहां कृष्ण भक्त मीराबाई को जहर दिया गया था। कृष्णभक्त मीराबाई का विवाह राणा सांगा के पुत्र भोज के साथ हुआ था। मुगलों के साथ हुए एक संघर्ष में वे घायल हुए और बाद में उपचार के दौैरान उनकी मृत्यु हो गई।

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Chittorgarh-fort से महाराणा प्रताप का सम्बन्ध

इतिहासकार डॉ लोकेन्द्र चुण्डावत कहते है यही किला है, जहाँ महाराणा प्रताप ने अपने जीवन के पच्चीस वर्ष व्यतीत किये थे। महाराणा प्रताप का बचपन चित्तौड़गढ़ किले में ही बीता था।

Chittorgarh-fort में दर्शनीय स्थल

  • विजय स्तंभ

    विजय स्तंभ चित्तौड़गढ़ फोर्ट

    विजय स्तंभ चित्तौड़गढ़ फोर्ट

विजय स्तम्भ महाराणा कुम्भा के द्वारा गुजरात और मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी की सेनाओं को पराजित करने के बाद चित्तौड़गढ़ किले के भीतर बनवाया था। इस टावर की ऊंचाई 37 मी है। इसे 9 मंजिला बनाया गया है। बाहर से देखने पर यह बहुत खूबसूरत दिखता है। इसके अंदर जाने पर आपको संकरी सीढ़ियां मिलेंगी। टावर के अंदर प्रकाश की व्यवस्था दयनीय हालत में है। यदि इसे ठीक कर दिया जाए तो शाम के समय यह भव्य दिखाई देगा।

  • कीर्ति स्तंभ

इसके अलावा कीर्ति स्तंभ भगेरवाल जैन व्यापारी जीजाजी कथोड़ ने बनवाया था। यह 12 वीं शताब्दी में बनवाया गया था,जबकि विजय स्तंभ 15वीं सदी में। यह 22 मी0 ऊंचा टावर है, जहां जैन धर्म से संबंधित चित्र बने हैं।

chittorgarh-fort का इतिहास क्या है यदि आप की दिलचस्पी इस बात को लेकर है तो किले के अंदर मौजूद म्युजियम आपके बड़े काम का है। इसके अलावा रानी पद्मावती का महल, जौहर कुंड, कीर्ति स्तंभ और विजय स्तंभ देख सकते हैं। कुछ लोगों के लिए किले की स्थापत्य कला अद्भुत है, तो कुछ यहां आकर दुनिया में सबसे बहादुर कही जाने वाले राजपूतों की वीरता की कहानियों और इतिहास से अभिभूत नजर आते हैं।

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Chittorgarh-fort कब जाएं

चित्तौड़गढ़ किले पर जाने का सबसे अच्छा समय सितंबर से मार्च के बीच का है। इस दौरान जाने पर आप राजस्थान की भयंकर गर्मी से बच सकते हैं। ज्यादातर देशी और विदेशी पर्यटक साल के इन्हीं महीनों में इस किले पर आना पसंद करते हैं।

Chittorgarh-fort कैसे जाएं

chittorgarh-fort का इतिहास क्या है

चित्तौड़गढ़ फोर्ट उदयपुर से निकटतम दूरी पर है और आप यहां हवाई, रेलवे और सड़क मार्ग के जरिए जा सकते हैं। चित्तौड़गढ़ किले से  उदयपुर की दूरी 70 किमी0 है। भारत के प्रमुख हवाई अड्डों से यहां के लिए सीधी उड़ान सेवाएं हैं। उदयपुर पहुंचकर आप बस, टैक्सी ले सकते हैं। इसके अलावा रेल और सड़क से भी उदयपुर अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

उम्मीद है आपको chittorgarh-fort का इतिहास क्या है ब्लॉग पसंद आया होगा। कमेंट के जरिए हमें जरूर बताएं।

धन्यवाद

Rj Vivek Singh

2 thoughts on “chittorgarh-fort का इतिहास क्या है

  1. Worship

    CHITTORGARH FORT is one of the most opulent fort in INDIA .
    I felt gracious being Rajputana.

    Reply

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