kedarnath yatra in 2020

By | October 25, 2020

How I completed my kedarnath yatra in 2020

मैंने अपनी केदारनाथ यात्रा कैसे पूरी की

 

kedarnath yatra in 2020

                                                           मेरी केदारनाथ यात्रा 2020

सहज सुजान आशुतोष भगवान शिव का परम धाम केदारनाथ एक ऐसा तीर्थ जहां मैं हमेशा से जाना चाहता था। पर न जाने क्यों पिछले साल से यह इच्छा और भी प्रबल हो रही थी कि मुझे केदारनाथ के दर्शन के लिए जरूर जाना चाहिए।

मैंने अपनी केदारनाथ की यात्रा कैसे पूरी की, पूरा ब्लॉग ही इसी के इर्द-गिर्द लिखा गया है। जिससे यदि आप यदि निकट भविष्य में प्लान बनाए तो आपको ज्यादा असुविधा न हो। तो शुरुआत से शुरू करते हैं।

कैसे बनाया केदारनाथ यात्रा का प्लान

kedarnath yatra in 2020

पिछले साल से ही मन में था कि बाबा केदारनाथ की यात्रा करके kedarnath yatra in 2020 उनके दरबार में हाजिरी जरूर लगवानी है। लेकिन कहते हैं ना हर चीज के लिए ऊपर वाले के पास टाइम टेबल फिक्स है। जब लगता कि अब चलके हाजिरी लगा देते हैं बाबा के दरबार में किसी न किसी कारण व्यवधान आता ही रहा।

फिर इसके बाद मार्च से ही कोरोना बिन बुलाए मेहमान की तरह आ टपका। अब जाने का नाम ही नहीं ले रहा। हम अतिथि तुम कब जाओगे वाले अंदाज में इस चायनीज वायरस के जाने का इंतजार करते रहे।

इस तरह हमारी केदारनाथ यात्रा बार-2 खटाई में पड़ती रही। हर बार लगता कि इंतजार और सही। लेकिन मन में महादेव के दर्शनों की इच्छा लगातार बनी हुई थी। शायद भोलेनाथ भी चाहते थे।

Kedarnath Yatra Starting Point 

हमने केदारनाथ यात्रा 2020 की शुरूआत कहां से की

 

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                             केदारनाथ मंदिर में शाम को आरती के समय ली गई फोटो

केदारनाथ यात्रा को पूरा करने के लिए कितनी दूरी तय करनी पड़ती है

Kedarnath Yatra Distance in Kilomitres

जैसे ही उत्तराखंड सरकार ने कुछ ढिलाई बरती, हमने अपनी यात्रा का जाल बुनने शुरू कर दिया। क्योंकि ट्रेन पूरी तरह से चल नहीं रही थी, इस वजह से उत्तराखंड तक पहुचना ही टेढ़ी खीर था। हमारे साथ चलने के लिए बहुत लोग तैयार थे, लेकिन कार्यक्रम तय नहीं हो पा रहा था।

कारण यातायात संबंधी पाबंदियां। मैं उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले से आता हूं। हमारे यहाँ से हरिद्वार ही लगभग 750 किलोमीटर दूर है। फिर भी जब मन बना लिया कि शाहगंज से ट्रेन से दिल्ली और फिर ट्रेन बदलकर ही दिल्ली से हरिद्वार पहुचेंगे। इसके लिए 6 अक्टूबर की तारीख भी पक्की हो गयी।

यह बात जब हमारे मित्र अंकुर द्विवेदी जी को पता चली तो उन्होंने भी साथ चलने का मूड बना लिया लेकिन प्लान में थोड़ी तब्दीली हो गयी। उन्होंने कहा कि सभी लोग उनकी कार से चलेंगे। इस तरह एक कार में चार योद्धा मैं यानि उदय सिंह, राम गुलाब, अंकुर और अनिल उत्तराखंड मे जाने को तैयार थे।

रविवार 27 सितम्बर 2020 को जब हम इकठ्ठे हुए तो प्लान फिर से बदल गया कि इसी बुधवार यानि 30 सितबंर को चलेंगे। अब समस्या वही कि ई-पास लिया जाए और केदारनाथ तथा बद्रीनाथ के दर्शन के लिए आनलाइन रजिस्ट्रेशन किया जाए। इस कागजी प्रकिया में  उत्तराखंड के कुछ दोस्तों ने भरपूर सहयोग किया। जिनका विशेष आभार रहेगा। उदय झा, त्रिलोक राज, पंकज जी, नीरज जाट आदि। लेकिन विपिन रावत जी के सहयोग के लिए हृदय से आभार।

इस तरह आनन-फानन  में सोमवार और मंगलवार को हमने केदारनाथ जाने की कागजी कार्रवाई पूरी की।  हमारा ई-पास 30 सितंबर से 7 अक्टूबर 2020 तक के लिए वैध था, अर्थात हम एक सप्ताह उत्तराखंड मे धुनी रमा सकते थे।

केदारनाथ यात्रा का दिन 30 सितं 2020 

Date of  Journey kedarnath yatra in 2020 / Sep 30th by own Vehicle

सब कुछ तय हो जाने के बाद हम 30 सितबंर की सुबह 6 बजे बजरंगबली का नाम लेकर निकल पड़े। पहली बार हरिद्वार जा रहे थे। इस वजह से रास्ता अन्जान था, फिर भी हमने लखनऊ से यमुना एक्सप्रेस वे Agra Lucknow Expressway पकड़ कर नोएडा जाने का प्लान किया। जिससे दूरी करीब 300 किलोमीटर बढ़ गयी। लेकिन समय लगभग बराबर ही लगा।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यमुना एक्सप्रेस वे की कुल लंबाई 165 किलोमीटर है। यह ग्रेटर नोएडा के परी चौक से शुरू होकर आगरा के कुबेरपुर गांव तक जाता है। जहां यह NH-2 से मिल जाता है। Agra Lucknow Expressway इसी का एक्सटेंशन है। जिसकी दूरी 302 किमी0 है।

यात्रा वाले दिन हम सुबह हम लोग निकल पडे। सुलतानपुर पहुंच कर कार की टंकी फुल कराई गई और फिर नॉनस्टाप चलना  स्टार्ट किया। लखनऊ से जब Agra Lucknow Expressway पर चढ़े तो पहले टोल पर ही जब 590 रूपये का टोल लगा तो समझ में आ गया कि गलती हो गयी, लेकिन अब क्या अब तो चलना ही था। 6 लेन की सड़क, तीन-तीन लेन मे विभाजित और ऊपर से बिल्कुल खाली। फिर तो कार अपने मर्जी से चलने लगी। दोपहर करीब एक बजे हमने आगरा पार किया। फिर एक पेड़ की छाया देखकर रुक गए और घर से लाया गया खाना खाया।

Everest base camp trek

उसके बाद नोएडा पहुंच कर जूस पिया गया। थोड़ा सा रुककर फिर चल पड़े और दिल्ली के बगल से होते हुए उत्तराखंड मे प्रवेश किया। जहाँ चेकिंग चल रही थी। यहाँ हमारा ई-पास चेक किया गया। शाम करीब 8 बजे हरिद्वार पहुंच गए। अब रुकने का मन था तो अंकुर दूबे ने कहा कि ऋषिकेश मे रुकते हैं। लगभग 9.30 बजे ऋषिकेश मे थे। हरप्रीत सिंह जी के गेस्टहाउस मे एक कमरे में रुक गए। जिसका किराया 700 रूपये था। वहाँ भी घर की पूरी सब्जी को निपटाया गया।

सोने से पहले तय हुआ कि सुबह ब्रश करके चलेंगे और देवप्रयाग मे स्नान किया जायेगा।

पहली अक्टुबर 2020 की सुबह हम उत्तराखंड की पवित्र जमीन पर थे

सुबह जल्दी ही हमउठ गये। मैं और अनिल उठकर गंगा जी के किनारे घूमने लगे। थोड़ी देर बाद आए तो सब जाग गए थे। 6.30 तक फिर कार में थे। अब हम देवप्रयाग वाले मार्ग पर आगे बढ़ने लगे, लेकिन ऋषिकेश से निकलते ही हमें पुलिस वालों ने रोक लिया। ई-पास चेक किये, फिर हमें भद्रकाली पुलिस चौकी की तरफ भेज दिया। क्योंकि ऋषिकेश से श्रीनगर तक का रास्ता बंद था।

भद्रकाली चौकी पर एक और बार ई-पास चेक हुए, और हमें राजेंद्रनगर, चम्बा, टिहरी होते हुए श्रीनगर जाने के लिए कहा गया। हम चलते गए। मनमोहक पहाड़ और नज़ारों ने मंत्रमुग्ध कर रखा था। पहले राजेंद्रनगर, फिर चम्बा और टिहरी झील तथा बांध करीब 12 बजे तक पार गए। टिहरी बांध के बाद एक मोड़ पर एक दुकान पर रूका गया।
यहाँ नाश्ता और भोजन की भी व्यवस्था थी, लेकिन हमने केवल चाय से ही काम चलाया।

kedarnath yatra in 2020 1 kedarnath yatra in 2020

                                                      टिहरी बांध kedarnath yatra in 2020

 

टिहरी बांध पर चाय की चुस्कियां खत्म कर फिर से गाड़ी स्टार्ट की और करीब 1.30 पर श्रीनगर पहुंच गये। यहाँ काफी भीड़-भाड़ थी। श्रीनगर, उत्तराखंड का भी एक प्रसिद्ध शहर है और बड़ा भी है। श्रीनगर पार करते ही अलकनंदा के किनारे सड़क पर मलबा गिर गया था, जिसकी सफाई चल रही थी, इसलिए यातायात रुका था।

हमने भी अपनी कार किनारे पार्क की और अलकनंदा के तट पर एक छोटे से ढ़ाबे पर कुछ खाने के लिए पहुंचे। ढ़ाबे पर  आलूपराठा, दाल-चावल और सब्जी के साथ मिल रहा था। यहाँ 30 रूपये मे पराठे और 40 रूपये मे भरपेट दाल चावल सब्जी मिल गयी। जिसे अलकनंदा के किनारे बैठ कर निपटाया गया। यहाँ अलकनंदा के तट काफी चौड़ाई में फैला हुआ है, नदी का प्रवाह भी काफी तेज था। अलकनंदा का ऐसा नजारा मैंने पूरे यात्रा मे और कहीं नही देखा था।

इधर हम खाना निपटाने में लगे थे और दूसरी ओर रास्ते में गिरा मलबा भी किनारे लगाया जा चुका था। एक बार दोबारा ट्रैफिक सुचारु रूप से चलने लगा तो  हम भी चल पड़े। मुश्किल से 20 मिनट चले थे कि फिर एक चेक पोस्ट आ गया। यहाँ फिर से ई-पास और रजिस्ट्रेशन चेक हुए तथा साथ-साथ थर्मल स्क्रीनिंग भी हुई। इसके बाद चलते हुए हम रुद्रप्रयाग पहुंच गये,।

यहां से केदारनाथ और बद्रीनाथ की सडकें अलग होती हैं। हम केदारनाथ अर्थात अगस्तमुनि की ओर मुड़ गये। अब NH 107 पर थे। अलकनंदा पीछे छूट गयी उसकी जगह मंदाकिनी ने ले ली। थोड़ा सा ही आगे बढ़े थे कि फिर चेकपोस्ट आ गया, यहाँ भी वही सब हुआ। इस प्रकार पांच बार हम चेक किए जा चुके थे। एक पुलिस वाले से मैंने पूछा भी, तो उसने बताया कि छूट का आज पहला दिन है, इसलिए चेकिंग ज्यादा है।

अगस्तमुनि में कार में पेट्रोल फुल कराया और गुप्तकाशी पहुंच गए। सडकें जगह जगह खुदी पड़ी थी। चारधाम योजना का कार्य चल रहा है, इसलिए पहाड़ भी तोड़े जा रहे हैं। जिसके मलबा सड़क पर आ जाने से यातायात रुक जाता है। जब साफ होता है तो यातायात दोबारा चालू हो जाता है।

रास्तों की खूबसूरती ऐसी कि मेरे पास तारीफ के लिए शब्द नहीं थे।, पहाड़, जंगल, झरनों को निहारते हुए अजीब आनंद आ रहा था। ऐसा करते हुए, हम करीब 6 बजे सोनप्रयाग पहुंच गए। यहाँ पर कार को पार्किंग में लगाया। यहां पार्किंग के लिए 120 रू0 देने पड़े। साथ ही बताया कि हर अतिरिक्त दिन के 100 रूपये लगेंगे। फिलहाल गाड़ी से जरूरी कपडे़ और सामान लेकर बाकी का लगेज गाड़ी में ही छोड़ दिया।

सोनप्रयाग में मंदाकिनी बासुकी नदी का संगम है। सोनप्रयाग समुद्रतल से लगभग 1830 मीटर की ऊंचाई पर है। हमें हल्की ठण्ड लगने लगी थी, पर मजा आ रहा था। सोनप्रयाग बहुत ही अच्छी जगह है।

अब छूट मिलने पर भीड़ बढने लगी थी, शायद यहाँ वाले अभी तैयार नहीं थे, जिसकी झलक हमें पूरे सोनप्रयाग मे दिख रही थी। एक घंटे से अधिक समय यहाँ बिताने के बाद हमने तय किया कि गौरीकुंड चलेंगे और आज कि रात वहीं बितायेंगे। फिर क्या एक गाड़ीवाले से बात हुई वह 200 रू0 मे तैयार हो गया और रात करीब 8 बजे गौरीकुंड पहुंच गये।

गौरीकुंड केदारनाथ यात्रा का बेसकैंप

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अब पहले कमरों की तलाश शुरू हुई। एकदम सामने ही दो कमरे मिल गए। जिनका किराया 500 रू0 में तय हुआ।  कमरे साफसुथरे और अच्छे थे। सामान रखकर हम बाहर आ गए।

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                                                                     gaurikund to kedarnath, kedarnath yatra in 2020

गौरीकुंड ,मंदाकिनी के तट पर 1980 मीटर की ऊंचाई पर बसा एक छोटा सा बाजार है। यही केदारनाथ यात्रा का बेसकैंप भी है, यहाँ से ही पैदल यात्रा शुरू होती है। मील के पत्थरों के हिसाब से केदारनाथ की कुल दूरी 16 किलोमीटर है, पर स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग 19 किलोमीटर का रास्ता है।

यहाँ मंदाकिनी अपने पूरी रवानी के साथ बह रही थी। यह मंदाकिनी ही थी, जिसने जून, 2013 में अपनी विकराल लहरों से केदारनाथ में जलप्रलय ला दिया था।  होटल की दूसरी मंजिल पर हमारे कमरे थे, होटल वाले ने बताया कि सबकुछ डूब गया और तबाह हो गया।

यदि नदी की धारा और अपने कमरों को देखें तो हम करीब 100 फुट से ज्यादा ऊंचाई थे। ऐसी बाढ़ की कल्पना ही रोंगटे हो जाते हैं। इसलिए इस जलप्रलय के लिए #हिमालयनसुनामी शब्द का प्रयोग किया गया। यहाँ गौरीकुंड है, जहाँ का जल सदैव उबलता रहता है। हम रात मे ही भ्रमण कर आये थे।

अब खाने के लिए आसपास नजर दौड़ाई तो ऑफसीज़न होने के कारण सिर्फ 5-6 दूकानें ही खुली थी। यहां एक दूकान एक दंपत्ति चलाते हैं। फिलहाल के लिए मैगी से काम चलाया। उन्होने बताया कि यहां दाल-रोटी और आलू की सब्जी मिल जाएगी।हमने बनाने को बोल दिया, और रात 10 बजे का समय भी दे दिया।तब तक हमसब गौरीकुंड घूमते रहे। करीब 10 बजे सब्जी, दाल और गरमागरम रोटियाँ खायी। मैगी और खाना मिलाकर प्रति व्यक्ति 140 रूपये से दिया गया। मतलब 40 की मैगी और 100 रूपये खाने का।

खाकर हमसब कमरों मे आ गए, और फिर सुबह आराम से उठने का तय करके सो गए।

2 अक्टुबर 2020 यानि गांधी जी के हैप्पी बड्डे वाले दिन 

गौरीकुंड, उत्तराखंड

हम सब रात के सोये, तो सुबह ही नींद खुली, सुबह 6 बजे तक नहाने का कार्यक्रम बनने लगा, तो कमरे मे से ही, बाल्टी और जग लेकर गौरीकुंड की ओर चल दिये। गौरीकुंड का सीधा रास्ता हमारे कमरे के नीचे से जाता था, मुश्किल से 100 मीटर दूर ही है, तो तौलिया लपेट कर हमसब चल दिये।

वहाँ पहुचने पर पता चला कि पानी तो उबल रहा है ,मैंने कहा कि बाल्टी मे पानी लेकर रखो  जिससे वह ठण्डा हो जायेगा। मै विज्ञान का छात्र रहा हूँ, ऊपर से गणित का अध्यापक तो मुझे पता है कि जल की विशिष्ट ऊष्मा बहुत अधिक होती है, इसलिए जल देर से गर्म होता है और देर से ठण्डा।

नहाने के बाद हमने बैग पैक किया। मैंने बिस्किट, सूखे मेवे, नमकीन,टॉफी और पानी की बोतल तथा एक पैण्ट शर्ट अतिरिक्त रख लिया। मौसम बिलकुल साफ था, फिर भी रेनकोट रख लिया। कल रात वाली दुकान पर, यहाँ मैगी का आर्डर दिया। दुकानदार से लॉकर रूम पूछने पर उसने कहा कि मुझे दे दो,मैं रख लूंगा। कल आकर ले लेना वो भी निःशुल्क।

हमने दो अितरिक्त बैग उसे दे दिये। मैगी खाकर चल पडे़। अनिल और अंकुर ने 30-30 रूपये मे लाठियां खरीदी। रामगुलाब बिना लाठी के चलेंगे और मेरे पास केंचुआ की स्टिक पहले से ही उपलब्ध है।

सुबह लगभग 7 बजे, kedarnath yatra in 2020

हम गौरीकुंड से निकले। गौरीकुंड चेकपोस्ट पर हमारे रजिस्ट्रेशन चेक किये गये, जो मैंने ऑनलाइन ही निकाल लिया था। इसलिए कोई दिक्कत नहीं थी। चेकपोस्ट के बाद घोड़ा पड़ाव पर मैंने अनिल से कहा कि यदि चलने मे दिक्कत हो तो तुम घोड़ा ले लो, तो उसने कहा कि “रात हो जायेगी तो चलेगा लेकिन मै अपने पैरों से ही चलकर जाऊँगा।”

यह विश्वास सुनकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा, फिर मैंने सबको बताया कि “नेटवर्क की ज्यादा समस्या नहीं है, जियो का नेटवर्क सब जगह मिलते जायेगा, इसलिए हम सम्पर्क में रहेंगे और सब अपनी चाल से चलो, जिसे दिक्कत होगी वह फोन करेगा।”

फिर रामगुलाब सबसे आगे निकल गए, मैं और अंकुर साथ साथ चल रहे थे। रास्ते की खूबसूरती ऐसी कि शब्द ही नहीं क्या लिखूं। एक तरफ हरा भरा ऊंचा पहाड़, दूसरी तरफ गहरी घाटियां जिसमें मंदाकिनी शोर करते हुए बह रही हैं और जगह-जगह गिरते अनगिनत झरने! वाह मजा आ गया।

इन दिलचस्प नज़ारों को देखने के चक्कर में अंकुर मुझसे आगे निकल गये। अब मैं अकेला था, ऊपर से मनमोहक प्राकृतिक सौन्दर्य, ऐसा लगता था कि ईश्वर ने बहुत ही ध्यान से और लगन से इसकी रचना की है। लेकिन मानव तो मानव है, वह कब तक प्राकृतिक नियम को मानेगा, जगह जगह फैलाये गए प्लास्टिक के कचरों से मन खिन्न भी हो जाता है। जून 2013 की तबाही, प्रकृति का निर्णय था, जिसे चाहो या न चाहो आपको मानना पडे़गा, शायद हम मानव भी कठोर और ध्वंसात्मक निर्णय से ही डरते हैं।

वह भी कुछ समय तक। लोगों मे इतनी बेसिक सी समझ नही कि अपने कचरे को कूडेदान मे ही डालें, जहाँ मन किया वहीं फेंक देतें हैं।  यही हाल तुंगनाथ और देवरिया ताल ट्रेक पर भी मैंने देखा। दुख होता है कि इन अकथनीय सुंदरता के क्या हम ही दुश्मन हैं?

फिलहाल मै यही सब सोचता आगे अपनी चाल मे चलता रहा। अनिल को चलने मे दिक्कत थी, इसलिए मैंने अनिल से फिर कहा कि घोड़ा ले लो,तो अनिल का जवाब वही था, बल्कि उसने कहा कि चलो आप, मैं आ जाऊंगा।

फिर मै अपनी सामान्य चाल से चलने लगा। जंगल चट्टी पर रामगुलाब मिल गए। फिर साथ ही साथ चलने लगे। पता चला कि अंकुर आगे निकल गये हैं। साथ चलते चलते हम भीमबली तक आ गए। यहाँ रूककर चाय पी।

चाय पीकर फिर चलने लगे, रामगुलाब भाई पिछडने लगे थे, तो मै रुककर उन्हें साथ लेकर चलने लगा था। मैंने अंकुर को फोन करके कह दिया कि ऊपर जल्दी पहुंच जाओगे तो सबसे पहले कमरा बुक कर लेना, क्योंकि भीड़भाड़ देखकर मुझे लग रहा था कि ऊपर पता नहीं अभी कमरे तैयार मिलेंगे या नहीं।

मैं रामगुलाब के साथ इसलिए भी चल रहा था कि अभी जल्द ही दो सप्ताह पहले ब्लड डोनेट किया था। जिसका असर मेरे ऊपर पड़ भी रहा था। इस तरह हम छोटी लिनचोली पहुंच गये। यहाँ से आगे बढने पर दो रास्ते हो जाते हैं, एक नया और दूसरा पुराना।हमने पुराना रास्ता पकड़ लिया, कुछ दूर चलने पर लोहे का एक पुल मंदाकिनी नदी पर बना है।

पुल पर पहुचते ही मंदाकिनी बिलकुल करीब आ जाती हैं। पुल हिल भी रहा था। पुल पर मैंने थोड़ा समय बिताया भी। कुछ नवयुवक आ गए जिससे मेरे और मंदाकिनी के वार्तालाप मे व्यवधान पड़ गया, इसलिए मैं चल पड़ा। अब बिलकुल खड़ी- चढाई थी। चलते चलते रामबाड़ा पर पहुंच गये।  कभी यहाँ एक बडी सी बाजार और होटलों का भरमार थी। आज सिर्फ दो टेंट की छोटी सी दुकान।

यहाँ एक दुकान पर रुककर मैंने माजा पिया, 15 वाला 20 रूपये मे मिला। कुछ देर के लिए यहाँ बैठ गया क्योंकि धूप बहुत तेज  थी। इसलिए मै थोड़ी छाया मिलने पर बैठकर आराम करने लगा। दुकानदार ने बताया कि आज इस वर्ष की सबसे ज्यादा भीड़ है। मैंने भी महसूस किया। लेकिन घोड़े से जाने वालों की संख्या सर्वाधिक दिखाई दे रही थी। अपनी आस्था को एक बेजुबान के ऊपर लादकर लोग जा रहे थे।

मैंने फिर से शुरू किया तो सामने खड़ी चढ़ाईष बिलकुल माता वैष्णो देवी से भैरोनाथ की जैसी चढ़ाई। यहाँ लगभग दो तिहाई रास्ते की चढ़ाई एकदम तीखी। मुझे ऐसी चढ़ाई पर मजा भी खूब आता है।

दोपहर लगभग एक बजे

मैं बडी लिनचोली पहुंच गया, यहाँ पूरा ब्यौरा नोट हो रहा था और थर्मल स्क्रीनिंग भी। लाइन में लग कर मैंने भी नियमानुसार थर्मल स्क्रीनिंग करवायी। फिर चलने लगा। एक बात और रामबाड़ा के बाद जितने भी शार्ट कट मिले मैंने सबको पकड़ लिया। बड़ी लिनचोली से आगे बढते ही, मुश्किल से 10 मिनट के बाद अंकुर भी मिल गये।

इन्होंने बताया कि थकान ज्यादा हो रही है, जो कि स्वाभाविक भी था क्योंकि अंकुर अभी दो सप्ताह पहले तक बीमार थे, एक हफ्ते पहले अस्पताल मे भी एडमिट थे।  इसलिए थकान लगना स्वाभाविक था।

मैं अंकुर के साथ चलने लगा, रास्ते में दो बर्फ के छोटे और पिघलते ग्लेशियर भी मिले। हम रुकते और चलते रहे। लगभग 2 बजे केदारनाथ बेसकैंप पहुंच गये थे।

थोड़ी सी बारिश होने लगी तो एक टिनशेड के नीचे बैठ गए, यहाँ करीब 10 मिनट रूक कर चल दिये, तब तक बारिश बंद हो गयी थी। लगभग 2.45 पर हम केदारनाथ पहुंच गये। मंदिर देखकर सारी थकान गायब हो गयी। यहाँ मै लाइन में लग गया और अंकुर को कहा कि जाओ बेंच पर बैठो। 10 मिनट लाइन मे लगने के बाद थर्मल स्क्रीनिंग हुई, फिर केदारनाथ धाम मे प्रवेश। मंदिर के सामने पहुचते ही भावविभोर हो गया। हाथ जोडकर महादेव को याद किया।

एक कमरा 800रू0 में तय कर लिया, जिसमें सुबह सबके लिए गर्म में पानी भी शामिल था। कमरा मंदिर से 100 मीटर ही दूर था।
अंकुर ने कहा कि मैं बहुत थक गया हूँ, इसलिए सोऊँगा। मैंने कहा बिल्कुल आराम करो, क्योंकि शाम की 6 बजे की आरती में शामिल होना है।

दोपहर के 3.30

मुझे गौरीकुंड से केदारनाथ मंदिर तक पहुचने मे 8 घंटे लगे थे, अपनी सामान्य चाल से। वैसे दूरी लगभग 16 किलोमीटर(ऑन रिकॉर्ड) पर स्थानीयों के अनुसार लगभग 19 किलोमीटर, और गौरीकुंड लगभग 2000 मीटर, केदारनाथ की ऊंचाई लगभग 3500 मीटर। इसप्रकार एक दिन मे 16 किलोमीटर दूरी और 1500 मीटर की ऊचाई 8 घंटे मे प्राप्त करना ऊपर से थकावट हावी न होने देना, यही मेरे लिये सबसे अच्छा था।

अब कमरे से बाहर आकर सबसे पहले एक प्लेट मैगी खायी जो यहाँ 50 रूपये हो गयी थी। फिर घूमने लगा, लाइन में लगकर दर्शन भी कर लिया। इस समय मंदिर के बाहर से ही दर्शन करवा रहे हैं। महादेव से क्षमा भी मांग लिया, इसके लिये।
मै फिर कमरे में नहीं गया, घूमने लगा। मंदिर के पीछे बर्फ से ढके पहाड़ों की चोटियां, ऊंचे हरे-भरे पहाड़ और बीच मे मंदिर, आह! शायद स्वर्ग ऐसा ही हो।

अगर कोई मुझसे पूछे कि आप कहाँ जाना पसंद करोगे तो प्राथमिकता मे आज भी वैष्णो माता कटरा, अब दूसरे स्थान पर केदारनाथ।

करीब 5 बजे शाम kedarnath yatra in 2020

अब तक रामगुलाब भी आ गये अनिल अभी भी दूर थे। मैं घूमता रहा शाम 6 बजे तक। तब अंकुर भी आराम करके आ गए थे।
उन्हें ठण्ड लग रही थी, तो उन्होंने एक टोपी और दस्ताना खरीदा। फिर हमने जलेबी खायी। इसके बाद आरती में शामिल हो गया। महादेव की आरती बहुत ही भव्य होती है, अलौकिक आनंद आता है।

सात बजे आरती खत्म हुई और मंदिर के कपाट बंद कर दिये गए। पता चला कि अब कल सुबह सात बजे खुलेंगे और दर्शन शुरू होगा। हमसब वहां घूमते रहे, ठण्ड बहुत थी, पर जाने का मन नही था। करीब 8 बजे कमरे पर पहुंचे जहाँ 150 रूपये प्रति थाली खाने के लिए तय हुआ था। उसने आकर पूछा तो मैंने बताया कि अभी मेरा एक बंदा आ रहा है जो 9 बजे के बाद आयेगा, इसलिए हमसब 9 बजे के बाद ही खायेंगे।

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अनिल को फोन किया तो उसने बताया कि रात मे पता नही चल रहा है कि कहाँ पर हूँ, लेकिन अब ज्यादा दूर नहीं है। मकान मालिक परेशान था कि ये लोग खा लें तो हम भी फुर्सत पायें, वह तीन बार खाने के लिए पूछ चुका था। हमने भी उसकी दशा देखकर कह दिया कि लाओ, लेकिन मेरा बंदा जो बचा है उसे गर्म खाना ही देना। जैसे खाना आया वैसे ही अनिल का फोन आ गया कि आ गया हूँ, जहाँ चेक कर रहे हैं।

मैंने कहा कि वहीं बैठो। अब कौन जाये, सब पस्त। मैं ही गया क्योंकि पता नहीं क्यों, मुझे बहुत थकान नहीं थी। अनिल नीचे ही पसर कर बैठे थे, मैंने उसका बैग लिया और कहा कि महादेव को हाथ जोडकर प्रणाम करो। मेरे पीछे चलो। सीढ़ियां चढ़ कर कमरे पर पहुंचते ही कहा कि भैया नीचे फ्लोर पर कमरा लेना था, मै मुस्कुरा कर रह गया। और हाँ मकान मालिक हम लोगों से जितनी बार मिलता उतनी बार जरूर कहता कि तुम लोगों ने फ्री मे कमरा ले लिया।

हमारे बाद जो आये, उन्हें दो -दो हजार मे कमरे दिये थे, अब तो लोगों को कमरा मिल भी नहीं रहा था। जब अनिल को लेने गया, कई लोग मिले जो कमरे के लिए परेशान थे। 1 अक्टूबर को उत्तराखंड मे छूट मिली और आज दो अक्टूबर है, ऊपर से 2,3,4 अक्टूबर छुट्टी। पूरा उत्तराखंड भर गया, जिसकी उम्मीद ये लोग नहीं की थी।

खाने के बाद नींद जोरों की आ रही थी तो हमने सोने की तैयारी की। मोबाइल पर देखा तो तापमान -1℃ बता रहा था, मतलब भयानक ठण्ड थी। कुछ देर मे हमें नींद आ गयी।

केदारनाथ ,उत्तराखंड
दिनाँक:- 03-10-2020

सुबह लगभग 5 बजे

मैं 5 बजे उठ गया, और ब्रश करके गर्म पानी की खोज में नीचे उतरा, जहाँ गेस्टहाउस के मालिक ने बताया कि 50 रूपये प्रति बाल्टी में पानी मिलेगा, तब मैंने उसे कल शाम का वादा याद दिलाया कि “आपने तो कहा था कि गर्म पानी फ्री में मिलेगा,” यहाँ मुझे दिल्ली वाले सर जी अनायास ही याद आ गये 😂,

तैयार होकर मैंने सबसे कहा कि मैं नीचे मंदिर में मिलुंगा। मैं मंदिर के लिए चल दिया, जैसे ही कमरे से निकलकर मंदिर के सामने आया तो हल्की सुबह होनी शुरू हो गयी थी। मौसम एकदम साफ था, अभी सूर्य देवता का पता नहीं था।

दिल को अपने वशीभूत करने वाले ऐसे नजारे मैंने नहीं देखे थे। मैं पूरी तरह से उनमे खो गया। सात बजे मंदिर के कपाट खुल गये तब जाकर मुझे होश आया, मैं अपने साथ वालों को खोजने लगा तो पता चला कि सब अभी कमरे में ही तैयार हो रहे हैं।

ठण्ड बहुत ज्यादा थी, इसलिए सन् स्क्रीम लगाने के लिए जैसे ही खोला वह बहने लगी। तब मैंने बताया कि यहाँ वायुमंडलीय दाब घट जाता है, जिसके कारण आयतन बढ़ जाता है। (बायल्स ला),इसलिए बिस्केट, चिप्स आदि के पैकेट फूल जाते हैं।  फिर सब तैयार होकर मंदिर पर आये।

वहीं गेस्टहाउस पर एक पंडित जी भी मिल गये थे, उनसे पूजन भी करवाने का फिक्स हो गया था. लाइन बहुत छोटी थी, लाइन में लगे, तो 10 मिनट में ही मंदिर के बाहर से दर्शन हो गये। फिर पण्डित जी ने हम सबको बैठाकर पूजा भी कराया. हमारे जल को ले जाकर शिवलिंग पर चढ़ाया, जिसके कारण हमें भी भगवान केदारनाथ शिवलिंग के बाहर से दर्शन भी गये।

chittorgarh-fort का इतिहास क्या है
हम भीम शिला पर भी गये. लगभग 8 बजे मैं और अंकुर भैरवनाथ मंदिर जाकर दर्शन करने को कहा तो राम गुलाब और अनिल ने मना कर दिया, फिर भी मै और अंकुर चल दिए. लगभग एक किलोमीटर की खडी़ चढाई चढ़कर भैरवनाथ मंदिर पर पहुँच गए. यहाँ कोई मंदिर नही है, बल्कि एक चट्टान पर भैरवनाथ हैं. यहाँ हवा बहुत तेज लग रही थी, हमने भैरवनाथ का दर्शन किया, फिर नीचे चल पड़े।

केदारनाथ मंदिर पर आकर सबसे मिल कर, सबको लेकर कमरे पर आया, यहाँ बैकपैक तैयार करके, गेस्टहाउस वाले का हिसाब किया. कमरे का 800 और 150 रूपये प्रति थाली. गर्म पानी का पैसा नहीं लिया, लेकिन अहसान फिर से जता दिया कि कमरा बहुत सस्ता दे दिया था।

बैग लेकर मंदिर के सामने आ गए, और हाथ जोड़कर महादेव को फिर शीश वंदन किया, और महादेव से प्रार्थना किया कि फिर जल्द ही बुलाना।

अब लगभग 10 बजे नीचे उतरना शुरू किया. सब साथ ही चल रहे थे, बेस कैंप से एक शार्टकट जा रहा था जिसे मेरे अतिरिक्त सब ने ले लिया, पर मैं मुख्य मार्ग पर ही गया. इस तरह मै सबसे अलग हो गया. लेकिन सबसे कह दिया कि गौरीकुण्ड में जहाँ बैग रखा गया है, वही सब पहुँच कर एक दूसरे का इन्तजार करेंगे।

वापसी में मैं लगभग 3 बजे गौरीकुण्ड में था। इस बार 8 घंटे का सफर मैंने 5 घंटे में पूरा कर लिया। फोन करके दोस्तों से पूछा तो पता चला कि वे अभी पीछे हैं। मैं अंकुर के साथ बस पकड़ कर 30 रू0 में सोनप्रयाग आ गया। गाड़ी से कपड़े निकाल कर बदल लिये। रहने की समस्या हल हो गयी 1000रू0 में अच्छा कमरा मिल गया। खाना भी 100 रू0 थाली के हिसाब से मिल गया।

जैसे खाना पेट में गया सफर की थकान ने हमें नींद की आगोश में झोंक दिया। बिस्तर पर सोये-सोये मुझे एक बात का अफसोस हो रहा था कि जब से लोगों ने  मुझे रात में एक बात कचोट रही थी, कि केदारनाथ यात्रा को लोग अब धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि पिकनिक स्पॉट बनाते जा रहे हैं, रास्तों में कचरा फैलाना, नशा करना जरूरी है क्या..
फिर कोई तबाही होगी तो दोष प्रकृति का?

बहुत बुरा लगता है लोगों को कचरा फैलाते देखकर, पता नहीं क्या बात थी कि एक जगह अनिल खाली पैकेट ऐसे ही फेंक दिये तो मैंने उन्हें बुरी तरह डांट दिया, जिसका अफसोस पूरे सफर में रहा, लेकिन लोगों को जब बेसिक समझ न हो तो गुस्सा आ भी जाता है, ऊपर से मैं नियमों का पक्का। प्रकृति से सदैव हाथ जोड़कर माफी मांगने वाला। यहाँ वहाँ कचरा फैलाना बिलकुल भी पसंद नहीं करता।

और अन्त में सिर्फ यही कहना है कि हमारी धार्मिक यात्राओं को ट्रैक का नाम देकर पिकनिक स्पॉट मत बनाईये, कृपया आप भी सहयोग करिये और अपने आने वाली पीढ़ी को एक स्वच्छ और साफ हिमालय देकर जाइये।

उदय सिंह

सहायक अध्यापक गणित

श्री हनुमत इंटर कॉलेज विजेथुआ सूरापुर

सुल्तानपुर

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