Living Root Bridge या जीवित पुल कहां हैं?

By | July 27, 2020

Living Root Bridge या जीवित पुल कहां है?

पिछले दिनों किसी ने Quora पर एक सवाल पूछा कि Living Root Bridge या जीवित पुल कहां हैं? सवाल वाकई दिलचस्प था, तो मैंने सोचा क्यों न इसका जवाब mysolotraveler.com पर दिया जाए।

 

Living Root Bridge मेघालय

                                                              डबल डेकर Living Root Bridge मेघालय

Living Root Bridge या जीवित पुल को लेकर आपके मन में कई सवाल होंगे। क्या है? कहां है? कैसा है? तो सब्र कीजिए आपके इन सारे सवालों के जवाब इस पोस्ट में मिलने वाला है। ऊपर दिखाई गई तस्वीर मेघालय के नोग्रियाट गांव के एक जीवित पुल की है। यह एक डबल डेकर यानी दोहरा पुल है।

 कहां हैं Living Root Bridge या जीवित पुल 

भारत के पूर्वोत्तर में बसा है मेघालय। मेघालय, जिसे बादलों का घर भी कहा जाता है। मेघालय सात बहनों वाले राज्यों में से एक है। मेघालय के पूर्वी खासी हिल्स जिले में Living root bridge या जीवित पुल बनाए जाते हैं। जीवित पुल बनाने के लिए पेड़ो का इस्तेमाल किया जाता है। इसी वजह से इन पुलों को जीवित या प्राकृतिक पुल कहा जाता है।

Living Root Bridge या जीवित पुल क्यों बनाए जाते हैं?

Living Root Bridge या जीवित पुल आखिर बनाते क्यों हैं? जब दुनिया में पुल बनाने की तरह-2 की आधुनिक टेक्नोलॉजी आ चुकी है। क्या कारण है इस तरह के पुल बनाने की। दरअसल जीवित पुल जहां बनाते हैं, वह दुनिया की सबसे ज्यादा वर्षा वाली जगह है। चेरापूंजी मेघालय में ही है, जहां दुनिया में सबसे ज्यादा वर्षा होती है। मेघालय दुनिया में सबसे आर्द्र (नमी वाली) जगह है।

यहां साल भर में औसत 12000 मिमी0 यानि 470 इंच बारिश होती है। जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। ज्यादा बारिश की वजह से कटी हुई लकड़ी, लोहे या अन्य धातुओं के बने पुल ज्यादा दिन तक नहीं चल सकते थे। लकड़ियां आसानी से सड़ जाती थी और लोहे पर आसानी से जंग लग जाती थी।

ऐसे में मेघालय के लोगों ने एक खास तरह के पुल बनाने शुरू किए जो आगे चलकर दुनिया के लिए अचरज का कारण बन गये। मेघालय में इस तरह के पुल कब से बनाए जा रहे है इसका कोई सटीक उत्तर नहीं मिल पाता है। लेकिन माना जाता है जीवित पुल बनाने की यह परम्परा हज़ारों सालों से चली आ रही है।

Living Root Bridge या जीवित पुल बनाए कैसे जाते हैं?

पूरी दुनिया को अचरज से भर देने वाले ये Living root bridge या जीवित पुल मेघालय के पूर्वी खासी जिले की खासी जनजाति के लोग बनाते हैं। दुसरे शब्दों में कहें तो खासी जनजाति को जीवित या प्राकृतिक पुल बनाने में महारत हासिल है। इन प्राकृतिक पुलों को बनाने के लिए खासी लोग एक खास  तरह की तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। वे लोग सदियों से इस तरह के पुल बनाते आ रहे हैं।

सबसे पहले जिस पहाड़ी नदी पर पुल जीवित पुल बनाना है वहां किसी एक किनारे पर रबर ट्री (जिसे वैज्ञानिक भाषा में फाइकस इलेस्टिका कहते हैं) को रोप दिया जाता है। यह बहुत कुछ अपने यहां पाये जाने वाले बरगद के पेड़ जैसा होता है। जिसमें आसमानी जड़े निकलती हैं। खासी लोग इन जड़ों को सुपारी के खोखले तनों के सहारे दुसरे किनारे पर पहुंचा देते हैं। इन जड़ों को जमीन में रोप दिया जाता है।

समय के साथ ये जड़ें पेड़ों में बदल जाती हैं। जब इन पेड़ों से वापस जड़ें निकलती हैं तो इन्हें दूसरे किनारे पर पहुंचा दिया जाता है। इन्हीं जड़ों को आपस में जाल के जैसे बुन दिया जाता है। जब यह जाल तैयार हो जाता है तो इस पर पत्थर और दूसरी लकड़ियों की सहायता से पुल बना लिया जाता है। इन पुलों को Living root bridge या जीवित पुल कहा जाता है।

Living root bridge या जीवित पुल बनाने की बात सुनने या पढ़ने में जितनी आसान लगती है, वास्तव में उससे कहीं कठिन है। इन पुलों को बनने में दशकों लग जाते हैं। कई पीढ़ियां मिलकर इनका निर्माण करती हैं। मेघालय के करीब एक दर्जन गांवों में Living root bridge या जीवित पुल बनाए जाते हैं। इन प्राकृतिक पुलों को स्थानीय भाषा में जिंग केंग इरो कहा जाता है।

इस तरह के प्राकृतिक या जीवित पुल समय के साथ मजबूत होते जाते हैं। कुछ पुल तो 500 साल से भी पुराने हैं। इनकी लंबाई करीब 50 मी0 तक होती है। ये पुल एक बार में लगभग 50 लोगों का भार सहन कर सकते हैं। कुछ स्थानों पर सुविधा के अनुसार खासी लोगों ने जीवित पुलों को डबल डेकर या दोहरा पुल बना लिया है।

पूर्वोत्तर का स्कॉटलैंड है मेघालय

आज़ादी के बाद मेघालय असम का ही हिस्सा था। साल 1972 में असम के दो जनजातीय जिलों पूर्वी खासी हिल्स और जयन्तिया हिल्स को मिलाकर मेघालय बनाया गया। मेघालय में होने वाली बारिश के कारण अंग्रेजों इसे पूरब का स्कॉटलैंड कहते थे। यहां स्थित चेरापूंजी एक कैलेन्डर माह में सबसे ज्यादा वर्षा का रिकॉर्डधारी है। जबकि मासिनराम को सालभर में सबसे अधिक वर्षा के लिए जाना जाता है। चेरापूंजी को अब सोहम के नाम से जाना जाता है।

 झूम खेती के लिए भी जाना जाता है जीवित पुलों का राज्य मेघालय

आप में से बहुत से लोग झूम खेती के बारे में जानते होंगे, लेकिन जिन्हें नहीं पता उनके लिए बता दें कि झूम मेघालय में की जाने वाली उस पारंपरिक कृषि को कहते हैं, जिसमें खासी और जयन्तिया जनजाति के लोग खेती के लिए जंगलों को काटते हैं। और उस पर खेती करते हैं। अगले साल नयी जगह पर जंगल साफ करके खेती करते हैं। इस विधि को झूम खेती कहते हैं।      

मेघालय के अन्य आकर्षण

मेरे हिसाब से अगर आप मेघालय का प्लान बनाते हैं तो आपका एक पंथ दो काज हो जाएगा। एक तो आप दुनिया के मशहूर Living Root Bridge या जीवित पुल देख पाएंगे, दूसरे आप पूर्वोत्तर के स्कॉटलैंड मेघालय घूम पाएंगे। मेघालय में 70 प्रतिशत भाग वन से ढ़का है। इन वनों में पर्याप्त वर्षा होती है। इस कारण से यहां वनस्पतियां और वन्यजीव अपनी विविधता के साथ मिलते हैं।

इन वनों में कुछ बहुत दुर्लभ पशु और पेड़-पौधे संरक्षित किये गये हैं। मेघालय में तीन वन्यजीव अभयारण्य हैं, नोंगखाईलेम, सिजु और बाघमारा अभयारण्य। बाघमारा अभयारण्य में मांसाहारी पौधा घटपर्णी या नेपेन्थिस खासियाना पौधा पाया जाता है। इस पौधे को स्थानीय भाषा में मे-मांग कोकसी कहते हैं।

नेपेन्थिस खासियाना

                                                                          कीटभक्षी पौधा घटपर्णी या नेपेन्थिस खासियाना

इसके अलावा मेघालय ऑर्किड की 300 से ज्यादा किस्मों के लिए भी प्रसिद्ध है। ऑर्किड दुर्लभ प्रजाति का फूल है जो विशेष वातावरण में ही पाया जाता है।

ऑर्किड का फूल

                                                               मेघालय की वादियों में खिला ऑर्किड का फूल

मेघालय के लगभग हर जिले में हुलॉक जिब्बन भी पाये जाते हैं। यहां पायी जाने वाली प्रजातियों में हाथी, भालू, रेड पांडा, भी पाये जाते हैं। मेघालय के जंगलों में पक्षियों की लगभग 650 से ज्यादा किस्में और तितलियों की 250 से अधिक प्रजातियां पायी जाती हैं।

हूलॉक जिब्बन मेघालय

                                                                               हूलॉक जिब्बन मेघालय

कुल मिलाकर मेघालय जैव विवधता से भरा हुआ एक ऐसा राज्य है, जहां आपकोे दुनिया में कहीं और न मिलने वाले जीवित पुल के साथ तरह-2 के पशु-पक्षी और पौधे देखने को मिल जाएंगे।

कैसे पहुंचें बादलों के घर मेघालय

मेघालय जाने के लिए आपको गुवाहाटी तक ही हवाई सुविधा मिल पायेगी। गुवाहाटी से शिलांग की दूरी सिर्फ 128 किमी0 है। शिलांग से आपको मासिनराम ट्रांसपोर्ट सेवा की सुविधा मिल जाएगी। जो आपको आपकी मनचाही जगह पर पहुंचा देगी।

 

यह ब्लॉग आपकी जानकारी के लिए लिखा गया है। पसंद आने पर प्लीज शेयर करें। आपके सुझाव और शिकायतों के लिए कंमेंट बॉक्स खुला है।

धन्यवाद

#Rj Vivek

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18 thoughts on “Living Root Bridge या जीवित पुल कहां हैं?

  1. Mudit Shah

    रोचक है मगर कई जानकारियां व्यक्तिशः बहुत परिचित सी हैं .बहुत से पाठक इसे नया भी पाएंगे .नई पोस्ट का इंतज़ार रहेगा .

    Reply
    1. Vivek Singh Post author

      आभार भैया। आप जैसे लोगों के निर्देशन में आने वाले ब्लॉग में नवीनता का प्रयास करेंगे।

      Reply
    1. Vivek Singh Post author

      धन्यवाद प्रफुल्ल जी।

      Reply
  2. Indrajit Pal

    बहुत ही अच्छा एवं ज्ञानवर्धक लेख, ऐसी चीज सुना था परन्तु पढ़ कर बढ़िया लगा।

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  3. Aman singh

    वाह सर जी आपका पोस्ट अच्छा लगा इसे पढ़ने के बाद देखने का मन करता है।

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    1. Vivek Singh Post author

      जब आप कहिए प्रबंध करवा दें

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  4. दीपक चंदेल

    कुछ तथ्यों कि जानकारी तो थी लेकिन जिस खूबसूरती से प्राकृतिक वर्णन किया गया है उससे उसे स्वयं आंखो में संजोने का में करता है।

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  5. Anjali rai

    आपका लेख पढ़ के मेघालय जाने की इच्छा जाग गए,कोरोना खत्म हो तो निकलें।

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  6. Aman singh

    Great thoughts and very interesting blog bhaiya. Helpful to know about new things…

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